उत्तर पश्चिमी पाकिस्तान में आतंकवादियों ने सुरक्षा बलों पर हमले तेज कर दिए हैं। इन हमलों से उनकी उग्रवाद के फिर से पनपने की आशंका बढ़ गई है। अफगानिस्तान में शांति प्रयास के चलते इसे अराजकता की वापसी के तौर पर देखा जा रहा है।
2001 में अफगानिस्तान पर अमेरिकी आक्रमण से भाग कर आए आतंकवादियों के लिए जातीय पश्तून सीमा क्षेत्र वर्षों से पनाहगाह बना हुआ था। लेकिन पाकिस्तानी सेना ने 2014 के आक्रमण में उनके गढ़ों को साफ कर दिया, जिससे अधिकांश लड़ाके अफगानिस्तान वापस भाग गए थे। लेकिन मार्च के बाद से, अल-कायदा से जुड़े पाकिस्तानी तालिबान को अफगान शांति वार्ता के चलते सीमा के पार अपने पनाहगाह को खोने का डर सता रहा है।
इसलिए उन्होंने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर हमले तेज कर दिए हैं। सीमा की जमीन पर खुद को फिर से स्थापित करने के लिए पाकिस्तानी तालिबान, या तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) ने जुलाई में आधा दर्जन छोटे उग्रवादी गुटों के साथ गठबंधन किया।
इस्लामाबाद स्थित संघीय शासित कबायली इलाका (फाटा) रिसर्च सेंटर के कार्यकारी निदेशक मंसूर खान महसूद ने कहा कि समूह की क्षमता और सैन्य ताकत बढ़ गई है। फाटा रिसर्च सेंटर के अनुसार, 2019 में जनवरी और जुलाई के बीच 67 हमलों में कम से कम 109 लोग मारे गए हैं।