मंगलवार यानी 20 जुलाई को व्हाइट हाउस में जो बाइडन के छह महीने पूरे हो जाएंगे। बीते 20 जनवरी को उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी। अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में पहले छह महीनों में राष्ट्रपति के रूप में जो बाइडन के प्रदर्शन की समीक्षा में मोटी राय ये उभरी है कि जोरदार शुरुआत के बाद अब बाइडन का एजेंडा संसदीय प्रक्रियाओं में उलझ गया है।
इस बारे में ब्रिटिश अखबार द गार्जियन में छपी एक टिप्पणी में कहा गया है- ‘उनका प्रदर्शन कैसा रहा है, यह सवाल कुछ ऐसा है कि गिलास आधा भरा है या आधा खाली है। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि रही 1.9 ट्रिलियन का कोरोना राहत पैकेज। इसके बावजूद पहले 100 दिन में उनको लेकर जो उत्साह दिखा था, वह अब कमजोर पड़ गया है। अब उन्हें हकीकत का सामना करना पड़ रहा है। उनका इन्फ्रास्ट्रक्चर पैकेज वॉशिंगटन के पेच में उलझ गया है। बंदूक नियंत्रण, आव्रजन सुधार और पुलिस बर्बरता रोकने की उनकी पहल भी गतिरोध का शिकार हो गई है।’
जन संगठन इनविजिबल के सह-कार्यकारी निदेशक लीच ग्रीनबर्ग ने मीडिया को दी गई अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि कोरोना राहत पैकेज इस बात का ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ प्रमाण है कि जो बाइडन अगर चाहें, तो उम्मीदें पूरी कर सकते हैं। लेकिन पिछले दो महीनों का ऊबाऊ अनुभव इन्फ्रास्ट्रक्चर पैकेज पर दोनों दलों की सहमति बनाने के लिए चली अनंत वार्ताएं रही हैं। ये पैकेज अपनी मंजिल तक पहुंचेगा, इसकी संभावना कम है, क्योंकि रिपब्लिकन पार्टी की इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं है।
नस्लीय न्याय के लिए काम करने वाले संगठन कलर फॉर चेंज के अध्यक्ष राशेड रॉबिनसन ने राय जताई है- ‘(बाइडन के एजेंडे के) आगे ना बढ़ पाने का कारण मौजूद ढांचा और सिस्टम हैं, जिनमें एक फिलिबस्टर नियम है। ऐसी नीतियों को भी पारित कराने के लिए चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, जो रंगभेद खत्म करने के लिए अतीत में उठाए गए उपायों जितने अहम हैं।’
मीडिया चर्चाओं में ध्यान दिलाया गया है कि अगले साल नवंबर में सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव के चुनाव होंगे। अगर उनमें डेमोक्रेटिक पार्टी ने और सीटें गंवा दीं, तो फिर उसके बाद बाइडन प्रशासन के लिए कोई अहम कदम उठाना असंभव हो जाएगा। न्यूयॉर्क स्थित थिंक टैंक फ्रेडरिक-एबर्ट-स्टिफटुंग के कार्यकारी निदेशक माइकल ब्रोनिंग ने राय जताई है- ‘हम अभी से अगले साल होने वाले चुनाव की चर्चा कर रहे हैं, जबकि 2024 में डोनाल्ड ट्रंप के फिर से राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की संभावनाएं बनी हुई हैं। राष्ट्रपति बदलने के साथ देश के एक से दूसरी धुरी पर पहुंच जाने के सिस्टम के कारण खतरा यह है कि नया राष्ट्रपति उन सब कदमों को रद्द कर सकता है, जो अभी उठाए गए हैं। उससे बात फिर घूम कर शुरुआती मोड़ पर पहुंच जाती है।’
विश्लेषकों के मुताबिक जो बाइडन के साथ समस्या यह है कि उनसे पूर्व राष्ट्रपतियों फ्रैंकलीन डी. रुजवेल्ट या लिंडन बी. जॉनसन जैसे दूरगामी महत्व के कदम उठाने की उम्मीदें पाली गई हैं, जबकि उनके पास संसद में वैसा बहुमत नहीं है, जैसा उन दोनों राष्ट्रपति के साथ रहा था। फिर उन्हें ऐसे माहौल में काम करना पड़ रहा है, जब देश दो धुरियों के बीच बंटा हुआ है। रिपब्लिकन पार्टी अपने शासन वाले राज्यों में बेखौफ हो कर धुर दक्षिणपंथी एजेंडे को लागू कर रही है।
सीआईए के पूर्व निदेशक लियोन पेनेटा ने कहा है- ‘इसमें कोई शक नहीं है कि मौजूदा कठिन चुनौतियों के बीच लोकतंत्र को कार्यरत बनाए रखने के लिए राष्ट्रपित बाइडन अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं। लेकिन जमीनी बात यह है कि देश में जो ताकतें सक्रिय हैं, उन्हें नियंत्रित करना बहुत मुश्किल है।’