आखिर इसकी वजह क्या है
प्रोफेसर चमनलाल बताते हैं, "पिछले 15-20 सालों में समाज में एक टुकड़ा ऐसा हुआ है जो चाहता है कि भगत सिंह का जो वैचारिक रूप है, जो उनका बौद्धिक रूप है और उनका चिंतक
क्रांतिकारी रूप लोगों के सामने आए ही नहीं। उनकी 125 लिखाई, बयान और लेख हैं। सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज, अछूत समस्या जैसे मुद्दे पर उनके विचार हैं। कई सामाजिक विषय हैं जो आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसे सामने नहीं आने देने वाले लोगों का इसमें निजी स्वार्थ है।"
सरहद पार भी हैं चाहने वाले
भगत सिंह एक ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्हें चाहने वाले जितने सरहद के इस पार मौजूद हैं तो उतने ही सरहद की दूसरी तरफ भी। पाकिस्तान में भी भगत सिंह की याद में हर साल 23 मार्च को खास कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। भगत सिंह के जन्म बंगा नाम के जिस गांव में हुआ था, वह पाकिस्तान में ही है। सरहद पार तमाम लोग इकट्ठा होते हैं और भगत सिंह को याद करते हैं। भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन नाम का एक संगठन भगत सिंह की यादों को पाकिस्तान में संजोने का काम कई सालों से करता आ रहा है।
इस संगठन के अध्यक्ष इम्तियाज कुरैशी ने बताया, "भगत सिंह की पाकिस्तान में बहुत इज्जत है। यहां उनके बहुत दीवाने हैं। उनके पिता, दादा का बनाया हुआ घर आज भी पाकिस्तान में मौजूद है। उनके दादा अर्जुन सिंह ने 120 साल पहले जो आम का पेड़ लगाया था, वो आज भी मौजूद है। उनके गांव का नाम बदल कर भगतपुरा रख दिया गया है। हर साल 23 मार्च को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की
शहीदी दिवस मनाया जाता है।"
'भगत सिंह का कत्ल हुआ'
भगत सिंह मेमोरयिल फाउंडेशन ने दो साल पहले लाहौर हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी जिसमें उन्होंने भगत सिंह की फांसी का मुकदमा दोबारा खोलने की बात कही थी। इस फाउंडेशन का मानना है कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को गलत मुकदमे के तहत फांसी दी गई और वे इस मामले में ब्रिटिश हुकूमत से माफी की मांग भी की थी। इम्तियाज कहते हैं, "ब्रिटिश हुकूमत ने भगत सिंह का अदालती कत्ल किया था। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का नाजायज खून बहाने के लिए ब्रिटिश हुकूमत को माफी मांगनी चाहिए।"
फांसी के इतने साल गुजर जाने के बाद भी भगत सिंह की तस्वीर एक ऐसे शख्स के रूप में उभरती है जिसने हर दिल का अजीज है। फर्क बस इतना है कि जिसकी भावना जैसी हो उसने भगत सिंह की छवि वैसी ही गढ़ ली है।