फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

म्यांमार: रोहिंग्या मुसलमानों को जल्द इंसाफ की उम्मीद नहीं, शरणार्थी कैंप में बढ़ीं मुश्किलें

Thu, 24 Feb 2022 04:04 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, यंगून

सार

हजारों रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश के शिविरों में रहने को मजबूर बने हुए हैं। हाल की खबरों के मुताबिक वहां उनके खिलाफ हिंसा बढ़ रही है। बांग्लादेश के कुतुपालोंग शरणार्थी शिविर में रह रहे 27 वर्षीय खिन मुआंग ने हाल में एक पत्रकार से कहा- ‘यहां सुरक्षा के इंतजाम पर्याप्त नहीं हैं।’
विज्ञापन
रोहिंग्या - फोटो : Agency (File Photo)
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय के खिलाफ अत्याचार के आरोपों पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में सुनवाई इस हफ्ते फिर से शुरू हुई है। लेकिन इस कार्यवाही के जल्द अंजाम तक पहुंचने की संभावना नहीं है। जानकारों का कहना है कि इस मामले में म्यांमार की सेना की जवाबदेही तय होने में अभी कई वर्ष लग सकते हैं।

ड्रग्स और मानव तस्करी की घटनाएं बढ़ीं

इस बीच हजारों रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश के शिविरों में रहने को मजबूर बने हुए हैं। हाल की खबरों के मुताबिक वहां उनके खिलाफ हिंसा बढ़ रही है। बांग्लादेश के कुतुपालोंग शरणार्थी शिविर में रह रहे 27 वर्षीय खिन मुआंग ने हाल में एक पत्रकार से कहा- ‘यहां सुरक्षा के इंतजाम पर्याप्त नहीं हैं।’ वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम ने अपनी एक ताजा रिपोर्ट में बताया है कि बांग्लादेश के दक्षिण-पूर्वी इलाके में मौजूद रोहिंग्या शरणार्थी कैंप अब दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा शिविर बन चुका है। वहीं एक रोहिंग्या शरणार्थी नेता की पिछले सितंबर में हत्या कर दी गई थी। साथ ही वहां ड्रग्स सेवन और मानव तस्करी की घटनाएं बढ़ने की खबर है।

विज्ञापन


संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी उच्चायुक्त के मुताबिक बांग्लादेश में नौ लाख 20 हजार से अधिक रोहिंग्या शरणार्थी मौजूद हैं। बांग्लादेशी मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक देश में अब ये चिंता गहरा रही है कि कहीं ये शरणार्थी अब स्थायी रूप से ही वहां ना बस जाएं। इससे लोगों में विरोध भाव बढ़ा है। उसे देखते हुए बांग्लादेश सरकार ने शरणार्थी शिविरों को चारों ओर से बाड़ से घेर दिया है।

जापान स्थित संस्था एसोसिएशन फॉर एड एंड रिलीफ के कार्यकर्ता हिरोआकी नाकात्सुबो ने वेबसाइट निक्कई एशिया से कहा- ‘बांग्लादेश में जन भावना रोहिंग्या शरणार्थियों के खिलाफ होती जा रही है। जबकि शिविरों में उनके रहने की स्थिति बिगड़ रही है। बेशक मकसद यही है कि ये लोग अपने घर लौट सकें। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, जरूरत इस बात की है कि शरणार्थी नौजवानों को शिक्षित और प्रशिक्षित किया जाए।’

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय तक पहुंचा था मामला

म्यांमार में दशकों से रोहिंग्या शरणार्थी भेदभाव के शिकार रहे हैं। 2017 में उनके खिलाफ पुलिस और सेना की ज्यादतियां तेजी से बढ़ीं। आरोप है कि सेना ने उनके गांव के गांव जला डाले। उसी वजह से हजारों की संख्या में रोहिंग्या मुसलमान सीमा पार बांग्लादेश और दूसरे देशों में चले गए। 2019 में गाम्बिया ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में एक केस फाइल किया, जिसमें आरोप लगाया गया कि म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों का नरसंहार किया गया है। जनवरी 2020 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने म्यांमार सरकार को नरसंहार रोकने के कदम उठाने के अस्थायी आदेश जारी किए। म्यांमार ने उस पर एतराज दर्ज कराया है।

विज्ञापन


इस हफ्ते शुरू हुई सुनवाई में पहले म्यांमार की आपत्तियों पर सुनवाई चल रही है। इस बीच ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि म्यांमार का प्रतिनिधि कौन है। जब ये म्यांमार की तरफ से आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं, तब वहां आंग सान सू ची के नेतृत्व वाली पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी का शासन था। लेकिन पिछले साल वहां सेना ने सत्ता पर कब्जा कर लिया।

म्यांमार के सैनिक शासन को अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने अभी तक मान्यता नहीं दी है। सैनिक शासन के विरोधियों ने म्यांमार में नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट (एनयूजी) नाम से एक समानांतर सरकार बनाई है। एनयूजी के विदेश मंत्री जिन मार आंग ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय कोर्ट के जजों को पहले यह तय करना चाहिए कि म्यांमार का पक्ष रखने का अधिकार किसे है।

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें