ग्लासगो में चल रहे कॉप-26 (जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन) में जंगलों की कटाई रोकने के लिए हुए समझौते में कई पेच हैं। उनकी आलोचना शुरू हो गई है। बता दें कि मंगलवार को जब समझौते पर 100 से ज्यादा देशों के नेताओं ने दस्तखत किए तो उसे कॉप-26 की अब तक की सबसे बड़ी कामयाबी बताया गया। हालांकि, समझौते का एलान होने के कुछ घंटों के अंदर ही आलोचकों ने इसकी कमियों को बताना शुरू कर दिया।
बताया गया है कि समझौते में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिससे यह साफ हो कि इसे लागू कैसे किया जाएगा। ऐसे में आलोचकों ने सवाल उठाया है कि क्या यह अतीत में हुए ऐसे समझौतों से अधिक प्रभावी हो सकेगा? जंगलों की कटाई को धरती का तापमान बढ़ने की एक बड़ी वजह समझा जाता है, जिस कारण जलवायु परिवर्तन हो रहा है। समझौते पर पहला सवाल खुद संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटारेस ने उठाया। उन्होंने कहा- ‘घोषणापत्र पर दस्तखत करना इसका सबसे आसान हिस्सा है। अनिवार्य यह है कि अब इसे लागू किया जाए।’
समझौते पर दस्तखत करने वाले देशों में अमेरिका, ब्रिटेन, अन्य यूरोपीय देश, ब्राजील, रूस, कनाडा और इंडोनेशिया शामिल हैं, लेकिन भारतीय अखबार द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक समझौते पर जिन देशों ने अपनी सहमति नही दी है, उनमें भारत, अर्जेंटीना, सऊदी अरब और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं। ये सभी देश जी-20 के सदस्य हैं। ब्रिटिश अखबार द फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक जिन देशों ने समझौते पर दस्तखत किए हैं, उनके यहां ही दुनिया के जंगलों का 85 फीसदी से ज्यादा हिस्सा मौजूद है। इन देशों में सहमति बनी है कि वे 2030 तक अपने यहां जंगलों की कटाई पूरी तरह रोक देंगे और कट चुके जंगलों की भरपाई के वनीकरण योजना लागू करेंगे।
मानव अधिकार संगठन ग्लोबल विटनेस के वन नीति प्रमुख जो ब्लैकमैन ने फाइनेंशियल टाइम्स से कहा- ‘हम अधिक विवरण की उम्मीद कर रहे थे। हमें इस बात से निराशा हुई है कि यह समझौते में मौजूद नहीं है। हमने अतीत में भी देखा है कि सरकारों ने जंगलों की कटाई रोकने का वादा किया, लेकिन बाद में उसे नहीं निभाया गया।’
जलवायु परिवर्तन के लिए मुहिम चलाने वाली संस्था पार्टनरशिप फॉर पॉलिसी इंटेग्रिटी की निदेशक मेरी बूथ ने कहा- ‘हमने देखा है कि पेरिस संधि के तहत देशों ने जो संकल्प लिया था, उसे पूरा करने में वे नाकाम हो रहे हैं। हमारी दिलचस्पी यह देखने में है कि क्या विश्व नेता ऐसे बारीक विवरणों के साथ सामने आते हैं, जिन्हें मापना संभव हो।’
जंगलों की कटाई के खिलाफ अभियान चलाने वाली संस्था माइट अर्थ के प्रमुख ग्लेन हुरोविट्ज ने फाइनेंशियल टाइम्स से कहा- ‘इस समझौते से स्थिति तभी बदल सकती है, अगर उस पर अमल की वास्तविक निगरानी और इस बारे में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।’
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक सबसे ज्यादा शक इस समझौते में ब्राजील के शामिल होने की वजह से पैदा हुआ है। वहां के राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो अमेजन जंगलों की कटाई का समर्थन करते रहे हैं। इसकी उन्होंने अनुमति दे रखी है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि उनके अतीत के व्यवहार को देखते हुए इस समझौते में उनका शामिल होना एक पाखंड की तरह लगता है।