फ्रांस की प्रधानमंत्री एलिजाबेथ बोर्न
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फ्रांस की प्रधानमंत्री एलिजाबेथ बोर्न के खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव संसद में नहीं टिक पाया। जून में हुए चुनावों के तुरंत बाद वामपंथी सांसदों के गठबंधन द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव ने सरकार की चिंता बढ़ा दी थी। हालांकि, संसद में केवल 146 सांसदों ने अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया। इसे पास कराने के लिए 289 मतों की आवश्यकता होती है।
बताया जा रहा है कि अविश्वास प्रस्ताव के जरिए वाम गठबंधन सरकार और राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की आर्थिक नीतियों के प्रति अपना विरोध जताना चाहता था। वाम गठबंधन ‘नुप्स’ ने हाल के संसदीय चुनाव के बाद प्रधानमंत्री एलिजाबेथ बोर्न के नेशनल असेंबली में पहले बड़े भाषण के मद्देनजर औपचारिक रूप से अविश्वास प्रस्ताव पेश करने का अनुरोध किया था।
हालांकि, इस प्रस्ताव को सांसदों द्वारा स्वीकार किए जाने की संभावना पहले से ही बहुत कम थी, क्योंकि अविश्वास प्रस्ताव को मंजूरी के लिए आधे से अधिक सांसदों (कम से कम 289 सांसदों) से मंजूरी मिलनी चाहिए। इसका मतलब यह है कि अगर कई विपक्षी सांसद अनुपस्थित रहते हैं, जबकि मैक्रों के गठबंधन के सदस्य इसके खिलाफ मतदान करते हैं, तो 289 की सीमा तक नहीं पहुंचा जा सकता।
संसद के निचले सदन में 147 सांसदों के साथ ‘नुप्स’ सबसे बड़ा विपक्षी गठबंधन है। मैक्रों के मध्यमार्गी गठबंधन ने पिछले महीने के चुनाव में अपना संसदीय बहुमत खो दिया, लेकिन अभी भी उसके पास 250 सदस्यों का समर्थन है। फ्रांस में केवल एक बार 1962 में अविश्वास प्रस्ताव को सफलता मिली थी।