इटली में मारियो द्राघी के प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद अब यहां ये कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या नई सरकार देश को मौजूदा आर्थिक संकट से निकाल पाएगी? द्राघी यूरोपियन सेंट्रल बैंक के प्रमुख रह चुके हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि चाहे जो भी हालात हों, वो अपने मकसद को हासिल करने की कोशिशों में जुटे रहते हैं। उन्हें संकट में फंसी मुद्रा यूरो को नवजीवन देने का श्रेय भी दिया जाता है।
वैसे यह पहला मौका नहीं है, जब इटली में सरकार का नेतृत्व कोई टेक्नोक्रेट कर रहा हो। 2011 में जब इटली गहरे आर्थिक संकट में फंसा था, तब अर्थशास्त्री और पूर्व यूरोपीय आयोग के पूर्व सदस्य मारियो मोंती को प्रधानमंत्री बनाया गया था। इटली के मामलों की जानकार अनुसंधानकर्ता लीजा जेनोती ने लंदन स्कूल ऑफ इकॉनिमिक्स के लिए लिखे एक लेख में कहा है- ‘तब भी यही राय थी और आज भी यह माना जा रहा है कि राजनेता स्थिति से निपटने में नाकाबिल हैं। जब हालत बिगड़ जाए, तब सत्ता टेक्नोक्रेट्स के हाथ में सौंप देने की इटली की प्रवृत्ति दीर्घकालिक रूप से लोकतंत्र के हित में नहीं है। लेकिन फिलहाल प्रधानमंत्री द्राघी और उनकी सरकार के सामने यह मुद्दा नहीं है। बल्कि उनके सामने देश में मौजूद वर्तमान स्वास्थ्य संबंधी और वित्तीय संकट की है।’
इटली में कोरोना वायरस महामारी से 93 हजार से ज्यादा लोग मर चुके हैं। देश पहले से आर्थिक संकट में था। कोरोना महामारी ने इसे बेहद गंभीर बना दिया है। इटली यूरोपियन यूनियन के तहत जर्मनी और फ्रांस के बाद तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। सेंटर फॉर यूरोपियन रिफॉर्म से जुड़े शोधकर्ता डॉ. लुइगी स्केजिरी ने टीवी चैनल यूरो न्यूज से कहा- ‘द्राघी का जोर फौरी हालात सुधारने पर होगा।
उनके सामने पहला काम यह देखना है कि कोरोना टोकाकरण की गति तेज हो। दूसरा काम यह सुनिश्चित करना है कि अर्थव्यवस्था में तेजी से सुधार हो। इसके लिए ईयू के रिकवरी फंड से मिली रकम को इस तरह खर्च करना होगा, जिससे अधिकतम आर्थिक वृद्धि दर हासिल की जा सके।’
टीकाकरण का काम पूरे यूरोप में धीमी गति से चल रहा है। इसकी वजह टीका बनाने वाली कंपनियों से अनुबंध करने और वैक्सीन को मंजूरी देने में हुई देरी है। हालांकि दूसरे ईयू देशों की तुलना में इटली इस मामले में तेजी से कदम उठाए, लेकिन उसने इस मामले में हेल्थ केयर कर्मचारियों को तरजीह दी है। इसका मतलब यह हुआ कि दूसरे लोगों खासकर बुजुर्ग या बीमार लोगों के कोरोना वायरस संक्रमण का शिकार की आशंका बनी हुई है।
जहां तक ईयू से मिलने वाले रिकवरी फंड का सवाल है, तो उसके लिए अगले अप्रैल तक हर देश को पहले ये योजना बना कर देनी है कि ईयू के दिशा-निर्देशों के मुताबिक वह इस रकम को कैसे खर्च करेगा। इन शर्तों में यह भी शामिल है कि 37 फीसदी रकम ग्रीन इकोनॉमी और 20 फीसदी रकम अर्थव्यवस्था को डिजिटल रूप देने पर खर्च की जाएगी।
स्केजिरी ने कहा- ‘द्राघी ने टैक्स सिस्टम, सार्वजनिक प्रशासन और न्याय व्यवस्था में सुधार की बातें की हैं। लेकिन यह करना आसान नहीं नहीं होगा, क्योंकि इसके लिए काफी समय और राजनीतिक समर्थन की जरूरत होगी। द्राघी एक बिखरे हुए गठबंधन का नेतृत्व कर रहे हैं, जिसके सभी दलों को इन सुधारों पर सहमत करना मुश्किल होगा।’
दरअसल द्राघी इसीलिए प्रधानमंत्री बन सके हैं, क्योंकि पिछली दो सरकारें गठबंधन सहयोगियों में विवाद खड़ा होने के कारण गिर गईं। पहले मेतियो रेन्जी और फिर गियूसेपे कोन्ते को इसी कारण प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। कोन्ते की सरकार इसलिए गिरी क्योंकि रेन्जी की पार्टी उनकी रिकवरी योजना पर सहमत नहीं हुई।
ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन में फेलॉ गियोवाना दी माइयो ने यूरो न्यूज से कहा- राष्ट्रपति ने द्राघी को प्रधानमंत्री बनने के लिए इसलिए आमंत्रित किया कि उनकी राय में कोरोना महामारी के बीच नया चुनाव नहीं हो सकता था। द्राघी के साथ सिर्फ यही सुविधा है कि वे राजनेता नहीं हैं और इसलिए उनका ध्यान बेहतर नतीजे देने पर टिका रहेगा।
लेकिन दूसरे जानकारों का कहना है कि वे सचमुच ऐसा कर पाएंगे, इसकी संभावना बहुत उज्ज्वल नहीं है। इसलिए कि आखिर देश में प्रधानमंत्री ही बदला है, वो हालात नहीं बदले हैं, जिनकी वजह से ये देश गहरे संकट में फंसा हुआ है।