इस मामले में उन्होंने अमेरिका की वाणिज्य मंत्री के पिछले महीने दिए एक बयान का जिक्र किया। संवाददाताओं से बातचीत करते हुए वाणिज्य मंत्री ने कहा था- ‘पूरी तरह अलगाव की बात करने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि अमेरिका और चीन दोनों एक दूसरे की अर्थव्यवस्था तक पहुंच बनाए रखना चाहते हैं।’ लेकिन उसके साथ ही उन्होंने जोड़ा कि अमेरिका का मकसद चीन में आविष्कार की रफ्तार को धीमा करना है। इसके लिए उसे यूरोप जैसे अपने सहयोगियों के साथ ज्यादा निकटता के साथ काम करना होगा।
मीडिया रिपोर्टों में कारोबारियों के हवाले से बताया गया है कि जब तक चीन के बाजार में वृद्धि जारी रहेगी, पश्चिमी कंपनियां वहां अपना निवेश बनाए रखेंगी। 2020 में यूरोप में साझा उद्यम में शामिल 27 फीसदी कंपनियों ने अपना निवेश बढ़ाया, जबकि 18 फीसदी ने इसमें कटौती की। लेकिन फाइनेंशियल टाइम्स ने कंपनी अधिकारियों से बातचीत के आधार पर कहा है कि ज्यादातर पश्चिमी कंपनियां क्रमिक रूप से चीन से कारोबार हटाने की योजना बना रही हैं।
इस रिपोर्ट के मुताबिक सेमीकंडक्टर, ऑटोमोबाइल और टेलीकॉम उद्योगों में आम राय है कि धीरे-धीरे अपना कोराबार हटाना समझदारी भरा कदम होगा। इन क्षेत्र की कंपनियों में आम राय है कि अगर सुरक्षा का वातावरण तनावपूर्ण बना रहा, तो चीन से हट जाना ही उचित कदम होगा। इसके अलावा चीन में हो रहे अंदरूनी बदलावों से भी कारोबार के लिए माहौल बिगड़ रहा है। यूरोपीय कंपनियों के बीच एक ताजा सर्वे में कंपनी अधिकारियों के बहुमत ने राय जताई कि चीन के नए साइबर सुरक्षा कानून, डेटा सुरक्षा कानून और निजी सूचना संरक्षण कानून का अगले पांच साल में विदेशी कंपनियों पर ‘गहरा नकारात्मक प्रभाव’ पड़ेगा।