रूस अपनी देनदारियां रूबल में चुकाने के अपने इरादे पर आगे बढ़ रहा है। जबकि पश्चिमी देश अभी तक इस रुख पर अड़े हुए हैं कि रूबल में चुकाई गई रकम को वे स्वीकार नहीं करेंगे। इस वजह से यह अंदेशा बना हुआ है कि रूस को डिफॉल्टर यानी समय पर अपनी देनदारी ना चुकाने का दोषी ठहरा दिया जाए।
रूस के वित्त मंत्रालय ने कहा कि जिस बैंक में रूस का धन है, उसने कर्ज का भुगतान करने के रूस के निर्देश को मानने से इनकार कर दिया। उस स्थिति में रूस को मैच्योर बॉन्ड के बदले भुगतान रूबल में करना पड़ा।
रेटिंग एजेंसियों ने कहा है कि ऐसे भुगतान को डिफॉल्ट की श्रेणी में रखा जाएगा। यानी समझा जाएगा कि रूस ने सही समय पर कर्ज नहीं चुकाया। अमेरिका स्थित वित्तीय संस्था- इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल फाइनेंस की उप-मुख्य अर्थशास्त्री एलिना रिबाकोवा ने एक समाचार एजेंसी से कहा- ‘जिस ऋण में रूबल में भुगतान का प्रावधान पहले से शामिल नहीं है, अगर उसका भुगतान रूस ने रूबल में किया, तो उसे डिफॉल्ट समझा जाएगा।’
इस बीच रूस यह एलान भी कर चुका है कि वह प्राकृतिक गैस और कच्चे तेल की बिक्री के बदले ‘अमित्र देशों’ से भुगतान सिर्फ रूबल में स्वीकार करेगा। जिन देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए हैं, उन्हें उसने अमित्र देशों की सूची में रखा है। रूस के इस फैसले को लेकर यूरोप में भ्रामक स्थिति बनी हुई है। यूरोप गैस की अपनी 40 फीसदी जरूरत के लिए रूस पर निर्भर है। ज्यादातर देशों का अभी तक यही कहना है कि वे रूबल में भुगतान नहीं करेंगे। लेकिन उनसे अलग रुख लेते हुए हंगरी ने कहा है कि उसे रूबल में भुगतान करने में कोई दिक्कत नहीं है।
इसी हफ्ते भारी बहुमत से दोबारा निर्वाचित होकर सत्ता में आए हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान ने बुधवार को कहा कि रूसी ऊर्जा पर यूरोपियन यूनियन के किसी भी प्रतिबंध के वे खिलाफ हैं। वे रूस का यह निर्देश स्वीकार करेंगे कि तेल और गैस के आयात के बदले आगे से रूबल में भुगतान किया जाए।