पोप बेनेडिक्ट सोलहवें ने अपना पद छोड़ने की घोषणा कर सबको हैरान कर दिया है। इसकी कोई वजह तो उन्होंने नहीं बताई है लेकिन अपने कार्यकाल में उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।
उन्हें 2005 में 78 वर्ष की उम्र में पोप चुना गया। इस तरह वो सबसे ज्यादा उम्र में पोप चुने गए लोगों में शामिल हैं।
2005 में जब पोप जॉन पॉल द्वितीय का निधन हुआ तो पियानो बजाने वाले प्रोफेसर कार्डिनल योसेफ रात्सिंगर रिटायरमेंट की सोच रहे थे। वो कह चुके हैं कि वो कभी पोप नहीं बनना चाहते थे।
लेकिन वो पोप बने और उनके कार्यकाल में कैथोलिक चर्च ने एक बड़े तूफान को झेला। ये तूफान था कैथोलिक पादरियों द्वारा बच्चों के यौन शोषण का मामला।
इसके अलावा वेटिकन में भ्रष्टाचार के आरोपों समेत कई और भी ऐसे मामले हुए जिनके कारण चर्च को अदंरूनी और बाहरी आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा।
दरअसल कार्डिनल रात्सिंगर ने ऐसे समय में पोप का पद संभाला जब दो हजार साल पुराना कैथोलिक चर्च तेजी से बदल रही दुनिया की तरफ से दी गई मुश्किल चुनौतियों का सामना कर रहा था।
'चर्च के अंदर पाप'
कैथोलिक चर्च की छवि को सबसे ज्यादा नुकसान बाल यौन शोषण के आरोपों से लगा। स्थानीय कैथोलिक पीठों और यहां तक कि वेटिकन पर भी इस तरह के मामलों में लिप्त पादरियों को बचाने और उनकी गतिविधियों पर पर्दा डालने के आरोप लगे।
ऐसे मामले सामने आए जब आरोपों का सामना कर रहे पादरियों को अन्य जगहों पर भेज दिया गया और वहां भी उन्होंने बच्चों का यौन शोषण जारी रखा।
हालांकि शुरू में वेटिकन के अधिकारियों ने मीडिया पर आरोप लगाया कि वो कैथोलिक चर्च की छवि पर कीचड़ उछाल रहे हैं, लेकिन बाद में पोप ने कहा कि चर्च अपनी जिम्मेदारी कबूल करता है और उन्होंने 'चर्च के भीतर पाप' की तरफ इशारा किया।
पोप ने न सिर्फ पीड़ितों से मुकालात की बल्कि उनसे माफी भी मांगी। उन्होंने कहा कि बिशपों को बाल यौन शोषण के मामलों की तुरंत खबर देनी होगी और ऐसे नियम भी बनाए जिनसे दोषी पादरियों को सजा दी जा सके।
पोप चुने जाने से पहले कार्डिनल रात्सिंगर 24 वर्ष तक वेटिकन में एक वरिष्ठ पद पर रहे। खासकर उन्होंने दिशानिर्देश तय करने वाली समिति के प्रमुख के तौर पर काम किया।
लेकिन 2005 में पोप चुने जाने के बाद उन्होंने कहा, “चर्च के अंदर कितना मैल है, यहां तक कि उनके बीच भी... जो पादरी हैं।”
शुरुआती जीवन
योसेफ रात्सिंगर का जन्म वर्ष 1927 में जर्मनी के बवेरिया राज्य में एक किसान परिवार में हुआ था, हालांकि उनके पिता एक पुलिसकर्मी थे। पोप बेनेडिक्ट कई भाषाएं बोल सकते हैं और मोत्सार्ट और बेठोफेन के रचे संगीत के शौकीन हैं।
14 साल की उम्र में योसेफ रात्सिंगर हिटलर यूथ में शामिल हो गए जो उस वक्त सभी युवाओं के लिए अनिवार्य था। दूसरे विश्व युद्ध के कारण उनकी पढ़ाई में बाधा आई।
जब युद्ध खत्म होने को था तो उन्होंने जर्मन सेना छोड़ दी थी और कुछ समय के लिए वो युद्ध बंदी के तौर पर गठबंधन सेनाओं की कैद में भी रहे।
बाद में 1959 से वो बॉन विश्वविद्याल में पढ़ाने लगे और 1966 में वो धर्मशास्त्र पढ़ाने ट्यूबिंगन विश्वविद्यालय चले गए. हालांकि वो इस बात से हैरान थे कि उनके छात्रों में मार्क्सवादी लोगों की बड़ी संख्या थी।
कार्डिनल रात्सिंगर की राय में धर्म को राजनीतिक विचारधारा से कमतर समझा जा रहा था और इसे वो ‘अन्यायी, क्रूर और बर्बर’ मानते थे।
कोमल और विनम्र
रात्सिंगर 1969 में अपने गृह राज्य बवेरिया के रेजेनबुर्ग विश्वविद्यालय चले गए और वहां डीन व उपाध्यक्ष बने। 1997 में पोप पॉल छठे ने उन्हें म्यूनिख का कार्डिनल नियुक्त किया।
योसेफ रात्सिंगर 78 वर्ष की उम्र में पोप बने। हालांकि वो कभी उतने करिश्माई नहीं रहे जैसा कि उनसे पहले पोप जॉन पॉल द्वितीय थे।
अमेरिकी वेटिकन विशेषज्ञ जॉन एल एलेन ने कभी लिखा था, “अगर जॉन पॉल द्वितीय पोप न होते तो वो जरूर कोई फिल्म स्टार होते।”
पोप बेनेडिक्ट सोहलवें की छवि धर्मशास्त्री रुढ़िवादी की रही है जो समलैंगिंकता, महिलाओं के पदरी बनने और गर्भनिरोधन जैसे विषयों पर कोई समझौता नहीं करना चाहता है। लेकिन उन्होंने मानवाधिकारों, पर्यावरण संरक्षण और गरीबी व अन्याय से सुरक्षा की बात की।
बतौर पोप उनके कार्यकाल की खास बात रही बुनियादी ईसाई मूल्यों का उनके द्वारा बचाव करना और वो भी ऐसे समय में जब यूरोप उनकी नजर में नैतिक गिरावट से जूझ रहा है।
पोप को नजदीक से जानने वाले उन्हें एक कोमल और विनम्र इंसान मानते हैं जो मजबूत नैतिक मूल्यों का पैरोकार है। एक कार्डिनल ने तो उन्हें “डरपोक लेकिन जिद्दी” बताया।