उत्तर कोरिया के हथियारों के प्रोग्राम को लेकर लंबे समय से जारी तनाव उस वक़्त चरम पर पहुंच गया जब उसने जुलाई में दो इंटर कॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया। उत्तर कोरिया के इस परीक्षण के बाद संयुक्त राष्ट्र ने नए आर्थिक प्रतिबंध लगाए और अमरीका के साथ युद्ध की भाषा में बात होने लगी। अब भी भड़काने का काम जारी है।
ऐसे में आख़िर उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग-उन चाहते क्या हैं? क्या अमरीका उत्तर कोरिया को परमाणु और मिसाइल प्रोग्राम छोड़ने के बदले कुछ भी दे सकता है? अमरीका और उत्तर कोरिया दोनों एक दूसरे पर हमले की धमकी दे रहे हैं।
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा था कि उत्तर कोरिया को ऐसे हमले के सामना करना पड़ेगा जिसे दुनिया ने कभी देखा नहीं है। इसके जवाब में उत्तर कोरिया ने प्रशांत महासागर में अमरीकी द्वीप गुआम पर हमले की योजना पेश कर दी। अभी तक साफ़ नहीं है कि कौन सी ऐसी राजनयिक प्रक्रिया बची है जिसके ज़रिए इस ख़तरनाक तनाव को ख़त्म किया जा सके। अमरीकी विदेश मंत्री और ट्रंप प्रशासन के अन्य अधिकारी राजनयिक गतिविधियों के ज़रिए समस्या को सुलझाने पर ज़ोर दे रहे हैं।
ट्रंप ने दिए थे संवाद के संकेत
यहां तक कि अतीत में ट्रंप ने भी किम जोंग-उन से बातचीत करने की इच्छा जताई थी। हालांकि उत्तर कोरिया की तरफ़ से संवाद शुरू करने के कोई संकेत नज़र नहीं आ रहे हैं। हाल ही में यूरोप में उत्तर कोरियाई अधिकारियों से अनौपचारिक रूप से बातचीत में कहा गया कि वह मिसाइल और परमाणु हथियारों के परीक्षण को लेकर अड़ा हुआ है।
अभी हाल ही में मनीला में एशियाई क्षेत्र मंच की बैठक हुई थी। आश्चर्यजनक रूप से अमरीकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन और उत्तर कोरियाई विदेश मंत्री रि योंग-हो के बीच कोई बातचीत नहीं हुई। वहीं दक्षिण कोरिया ने उत्तर कोरिया के सामने बातचीत का प्रस्ताव रखा था, लेकिन कोई तवज्जो नहीं मिली। सैद्धांतिक रूप से तनाव को ख़त्म करने के लिए उत्तर कोरिया के सामने अमरीका कोई प्रस्ताव रख सकता है. इसमें शांति को स्थापित करने के लिए समझौते की पेशकश की जा सकती है।
दोनों देशों के बीच है भारी अविश्वास का माहौल
किम जोंग-उन
दोनों देशों के बीच भारी अविश्वास का माहौल है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र ने कोरिया पर काफ़ी कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। इन प्रतिबंधों में खनिज और खाद्य सामग्रियों के निर्यात को निशाना बनाया गया है। इसके साथ ही विदेशों में उत्तर कोरियाई मजदूरों पर भी पाबंदी लगाई गई है।
उत्तर कोरिया को झुकाने के लिए ये सब किया जा रहा है। क्या उत्तर कोरिया का परमाणु हथियार आख़िरी लक्ष्य है जिससे उसे झुकाया नहीं जा सकता है? 2011 में सत्ता में आने के बाद से किम जोंग-उन ने पूरा ध्यान सैन्य आधुनिकीकरण और आर्थिक संपन्नता पर दिया। उत्तर कोरिया की परमाणु आकांक्षा 1960 के दशक से ही रही है। उत्तर कोरिया के मन में सैन्य और राजनीतिक स्वायत्तता की चाहत कभी ख़त्म नहीं हुई। यह चाहत न केवल उसके पारंपरिक दुश्मन अमरीका, जापान और दक्षिण कोरिया के ख़िलाफ़ है बल्कि अपने ऐतिहासिक पार्टनर चीन और रूस पर निर्भरता से भी मुक्त होना चाहता है।
आख़िर क्यों?
उत्तर कोरिया की यह प्रेरणा उसके सामरिक हितों के पक्ष में है। उत्तर कोरिया के सामने लीबिया और इराक़ की मिसाल है। उत्तर कोरिया को लगता है कि लीबिया और इराक़ बनने से बचना है तो उसे भारी बर्बादी के विश्वसनीय हथियारों को किसी भी सूरत में हासिल करना होगा। हालांकि, अमरीका ने कहा है कि उत्तर कोरिया से उसकी कोई दुश्मनी नहीं है।
उत्तर कोरिया का कहना है कि दक्षिण कोरिया में अमरीका 28 हज़ार सैनिकों के साथ बड़ी परमाणु शक्ति के रूप में मौजूद है। उसका यह भी कहना है कि अमरीका की परमाणु हथियारों का पहले इस्तेमाल की नीति उसके लिए बड़े ख़तरे की तरह है। परमाणु और मिसाइल परीक्षण का लक्ष्य किम जोंग-उन की पहचान की राजनीति का भी हिस्सा है।
उत्तर कोरिया में किम वंश के राजनीतिक नेतृत्व की जड़ें अमरीका से दु्श्मनी और उससे बचाव से जुड़ी हुई हैं। 1950-53 के कोरियाई युद्ध में उत्तर कोरिया का प्रौपेगैंडा यही था कि अमरीरका को उत्तर कोरियाई नागरिकों के दुश्मन के रूप में दिखाया जाए जो उनके देश को बर्बाद करना चाहता है।
युद्ध में अमरीकी कार्रवाइयों को याद करते हुए उत्तर कोरिया की पुरानी पीढ़ी बताती है कि उनके देश के लगभग सभी अहम शहर बर्बाद हो गए थे. ये बातें उत्तर कोरिया की वर्तामान पीढ़ी को किम जोंग-उन की राजनीति से सहमत कराने में मदद करती हैं। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल में धमकी भरा जो बयान दिया उससे भी किम जोंग-उन के प्रॉपेगैंडा को बल मिला है. ऐसे में से वहां की जनता के बीच एक संदेश जाता है कि ऐसे वक़्त में देश के नेतृत्व के साथ खड़ा रहना उनका परम कर्तव्य है।
उत्तर कोरिया क्या अमरीका के साथ रह सकता है?
किम जोंग-उन और ट्रंप
उत्तर कोरिया ने मिसाइल परीक्षण के अभियान को तेज किया है और पिछले साल सफल परमाणु परीक्षण के कारण उसकी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ी है। हाल की अमरीकी खुफिया रिपोर्टों का कहना है कि उत्तर कोरिया के पास 60 के करीब परमाणु बम हैं। हालांकि, कुछ विश्लेषकों को इस पर भरोसा नहीं है। चार और 28 जुलाई को उत्तर कोरिया ने जिन मिसाइलों का परीक्षण किया है उनसे संकेत मिलते हैं कि उसने अमरीका के कुछ हिस्सों को निशाने पर लेने की क्षमता हासिल कर ली है।
बुलेटिन ऑफ एटोमिक साइंटिस्ट की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर कोरिया के परमाणु शक्ति संपन्न होने के इरादों पर सवाल खड़ा किया गया है. हालांकि परमाणु क्षमता हासिल करने के मामले में नाटकीय प्रगति को लेकर कई तरह की शंकाएं भी हैं।
अमरीका इस मामले में बिल्कुल स्पष्ट है कि वह उत्तर कोरिया को न तो परमाणु शक्ति संपन्न देश मानेगा और न ही उसके परमाणु कार्यक्रमों को बर्दाश्त करेगा। लेकिन उत्तर कोरिया जिस तरह के हर दिन कर रहा है वैसे में अमरीका के अहम सहयोगी दक्षिण कोरिया और जापान की चिंता बढ़ती जा रही है। अगर उत्तर कोरिया नहीं रुका को इस इलाक़े में हथियारों की होड़ शुरू हो सकती है और वैश्विक परमाणु अप्रसार नीति को भी गहरा झटका लग सकता है।
आख़िर उत्तर कोरिया चाहता क्या है?
उत्तर कोरिया की प्राथमिकता है कि वह मिसाइल और परमाणु परीक्षण जारी रखे ताकि युद्ध की स्थिति में उसके पास पर्याप्त प्रतिरोधक क्षमता हो। किम जोंग-उन के मन में यह बात मजबूती से बैठ गई है कि उनकी अहमियत और प्रासंगिकता इसी नीति के इर्द-गिर्द है। उसे इस मामले में चीन से कोई दिक़्क़त नहीं होगी क्योंकि वह उत्तर कोरिया पर प्रतिबंधों को लेकर अनिच्छुक है भले उसने संयुक्त राष्ट्र के हालिया प्रतिबंध का समर्थन किया था।
कई अनुभवी पर्यवेक्षकों का मानना है कि उत्तर कोरिया एक ठोस सामरिक स्थिति में आने के बाद संवाद की प्रक्रिया में शामिल हो सकता है। (डॉ जॉन निल्नसन-राइट चैटम हाउस में उत्तरी-पूर्वी एशिया और एशिया प्रोग्राम को सीनियर रिसर्च फेलो हैं. इसके साथ ही वह जापानी राजनीति और पूर्वी एशियाई अंतरराष्ट्रीय संबंधों के यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज में लेक्चरर हैं।)