अंडों के सफेद हिस्से, आंसू की बूंदों, लार और स्तनपायी प्राणियों के दूध में पाए जाने वाले प्रोटीन का इस्तेमाल बिजली पैदा करने के लिए किया जा सकता है। इन सभी चीजों में लाइसोजाइम नामक एक ऐसा प्रोटीन पाया जाता है जिस पर दबाव डालने से बिजली पैदा की जा सकती है।
आयरलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ लाइमरिक के शोधकर्ताओं के अनुसार यह सबको मालूम है कि क्वार्ट्ज के क्रिस्टल पर दबाव डालने से बिजली पैदा हो सकती है।
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अल्ट्रासाउंड मशीनों और मोबाइल फोन के वाइब्रेटर में इसका इस्तेमाल भी किया जा रहा है, लेकिन पहली बार जैविक सामग्री से इस तरह के बिजली पैदा करने में कामयाबी मिली है। चिकित्सा के क्षेत्र में इसे बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे नए किस्म के मेडिकल उपकरण खासकर बायोमेडिकल उपकरण विकसित करने में मदद मिलेगी। शरीर में नियंत्रित मात्रा में दवा पहुंचाने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
पीजोइलेक्ट्रिसिटी
क्रिस्टल पर दबाव डालकर बिजली पैदा करने को पीजोइलेक्ट्रिसिटी कहा जाता है। क्वार्ट्ज या शीशा (लेड) जैसे कुछ पदार्थों में यह गुण पाया जाता है। इसके अलावा हड्डियों में भी यह गुण पाया जाता है।
लेकिन रासायनिक पदार्थ से पीजोइलेक्ट्रिक पैदा करने का सबसे बड़ा खतरा यह है कि उनसे जहर फैलने की भी आशंका रहती है। इसके मद्देनजर जैविक स्रोतों से पीजोइलेक्ट्रिसिटी हासिल करना वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि है।