कुछ यूरोपीय अधिकारियों ने इस सिलसिले में सीरिया का जिक्र किया। कहा कि जब अमेरिका ने वहां अपना रुख बदला था, तो उससे अमेरिका में नहीं, बल्कि यूरोप में संकट खड़ा हुआ था। गौरतलब है कि जब बराक ओबामा राष्ट्रपति थे, तब अमेरिका ने अचानक सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद की सेनाओं पर हमला करने का फैसला बदल लिया था। उसके बाद यूरोप पहुंचने वाले सीरियाई शरणार्थियों की संख्या तेजी से बढ़ी थी। अब आशंका है कि ऐसा ही अफगान शरणार्थियों के मामले में हो सकता है।
यूरोपियन यूनियन ने शरणार्थियों की बाढ़ रोकने के लिए 2015 में टर्की के राष्ट्रपति रजिब तैयिब एर्दोआन की सरकार को धन दिया था। थिंक टैंक ज्याइंट काउंसिल फॉर वेलफेयर ऑफ इमिग्रेंट्स की ग्रीस शाखा के प्रमुख जोय गार्डनर ने सीएनएन से कहा- ‘तब टर्की से करार करने का उलटा असर हुआ था। अचानक एर्दोआन ने उन लोगों का इस्तेमाल एक हथियार की तरह करने लगे।’ इससे यूरोप के लोगों में आशंकाएं बढ़ीं। जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि 2015 के बाद यूरोप में उन राजनीतिक गुटों की ताकत बढ़ी, जो यूरोपियन यूनियन के विरोधी हैं।
अब जानकारों को उम्मीद नहीं है कि अब अफगानिस्तान के मामले में यूरोपियन यूनियन कोई बेहतर रास्ता ढूंढ पाएगा। यूरोपियन यूनियन (ईयू) के एक अधिकारी ने सीएनएन से कहा कि ईयू अफगानिस्तान में मानवीय सहायता के कार्यक्रमों को धन दे सकता है। वहां मानव अधिकार, महिला अधिकार और लोकतंत्र के लिए माहौल बनाने की योजनाएं वह चलाना चाहता है। लेकिन ईयू के सदस्य देशों को इसके लिए राजी करना मुश्किल होगा, क्योंकि अफगानिस्तान में तालिबान का राज कायम हो चुका है। इसलिए शरणार्थियों को आने से रोक पाने की संभावना फिलहाल धूमिल है।