म्यांमार के रखाइन प्रांत में हाल में बागियों और सुरक्षा बलों के बीच मुठभेड़ की बढ़ी घटनाओं ने देश के अन्य हिस्सों में भी सशस्त्र बगावत के फैलने की आशंका पैदा कर दी है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस साल एक फरवरी को देश में हुए सैनिक तख्ता पलट के बाद हथियारबंद बागियों की तरफ से वैसे हमले नहीं हुए, जैसे हाल में रखाइन प्रांत में देखने को मिले हैं। खबरों के मुताबिक नवंबर के दूसरे हफ्ते में अराकान आर्मी नाम के बागी गुट ने कई हमले किए। उसके बाद भी रखाइन प्रांत से अशांति की खबरें मिली हैं।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि अराकान आर्मी एआरएसए की तुलना में कहीं अधिक मजबूत गुट है। ये अलगाववादी गुट 2020 के पहले तक म्यांमार की सेना के साथ ‘युद्ध’ में जुटा हुआ था। लेकिन युद्धविराम समझौते के बाद एक साल की शांति अब टूट गई है। युद्धविराम के बाद इस महीने पहली बार उसकी सेना से मुठभेड़ होने की खबर आई है। थिंक टैंक इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के वरिष्ठ सलाहकार रिचर्ड हॉर्सी ने कहा है कि भले एक साल से ज्यादा समय तक दोनों पक्षों ने युद्धविराम का पालन किया, लेकिन उनके मकसद आज भी एक दूसरे के खिलाफ हैं।
हॉर्सी ने टीवी चैनल अल-जजीरा से कहा- ‘अराकान आर्मी ने युद्धविराम की अवधि का इस्तेमाल अपने बलों की तैनाती को नया रूप देने और अपने प्रभाव वाले इलाकों में अपना प्रशासन मजबूत करने के लिए किया। ऐसे में किसी ना किसी समय सेना को वहां दखल देना ही था।’ रखाइन स्थित मानव अधिकार संगठन वॉन लार्क फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक खाइंग कुआंग सान ने अल-जजीरा से कहा- ‘अगर 2018-20 जैसी लड़ाई फिर छिड़ गई, तो इस बार ज्यादा विनाश होगा और अधिक संख्या में लोग विस्थापित होंगे।’