बढ़ता इलेक्ट्रानिक कचरा दुनियाभर में सेहत और पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक फिलहाल पांच करोड़ टन ई-कचरा हर साल निकल रहा है, जो वर्ष 2050 तक बढ़कर 120 करोड़ टन सालाना हो जाएगा। यह अब तक बने कुल व्यावसायिक विमानों के वजन से भी ज्यादा होगा। विश्व आर्थिक मंच द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक फिलहाल हर वर्ष 62 अरब डॉलर से ज्यादा का ई-कचरा निकलता है। यह हर साल बनने वाली कुल चांदी की कीमत से तीन गुना ज्यादा है।
दावोस में चल रहे विश्व आर्थिक मंच के सम्मेलन के दौरान गुरुवार को जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक एक टन स्वर्ण अयस्क में जितना सोना होता है उससे 100 गुना ज्यादा सोना एक टन मोबाइल फोन में होता है। रिपोर्ट बताती है फिलहाल जितना ई-कचरा और प्लास्टिक निकल रहा है उसका केवल 20 प्रतिशत ही री-साइकल हो पाता है। यह स्वास्थ्य और पर्यावरणीय तबाही को बताने के लिए काफी है। गौरतलब है कि 2016 में 4.47 करोड़ टन ई-कचरा दुनियाभर में होता था जो 2021 तक 5.52 करोड़ टन सालाना पहुंच जाएगा।
नाइजीरिया में री-साइकल इंडस्ट्री
रिपोर्ट में बताया गया कि पर्यावरण संरक्षण, मानव स्वास्थ्य की रक्षा, स्थायी और समावेशी विकास के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। नाइजीरिया सरकार, वैश्विक पर्यावरण फैसिलिटी (जीईएफ) और संयुक्त राष्ट्र निजी निवेशकों के साथ मिलकर 15 अरब डॉलर से नाइजीरिया में ई-कचरा री-साइकल इंडस्ट्री की शुरुआत करने जा रहा है। इस प्रोजेक्ट में जीईएफ 2 अरब डॉलर लगाएगा जबकि 13 अरब डॉलर डेल, एचपी, माइक्रोसॉफ्ट तथा फिलिप्स जैसे निजी निवेशक लगाएंगे। इससे नाइजीरिया में एक लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलने की उम्मीद है।
भारत भी शीर्ष पांच देशों में
बीते साल जून में वाणिज्य एवं उद्योग मंडल एसोचैम और नेशनल इकोनॉमिक काउंसिल द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक ई-कचरा पैदा करने वाले शीर्ष पांच देशों में भारत भी है। भारत से ऊपर सूची में चीन, अमेरिका, जापान और जर्मनी हैं। भारत में कुल ई-कचरे का पांच फीसदी ही री-साइकिल होता है।