जब TIME (टाइम) मैगजीन ने वर्ष 2020 के लिए 100 प्रभावशाली लोगों की अपनी सूची जारी की, तो ज्यादातर लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अभिनेता आयुष्मान खुराना, शाहीन बाग विरोध में शामिल रहीं प्रदर्शनकारी बिलकिस, अल्फाबेट और गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई जैसे नामों की पहचान कर सकते हैं। लेकिन इस सूची में एक ऐसा नाम भी था - रवींद्र गुप्ता, जो विशिष्ट रूप से भारतीय था, लेकिन अधिकांश भारतीयों को तुरंत याद नहीं आया।
टाइम मैगजीन के रवींद्र गुप्ता के पेज पर जाने से पता चलता है कि उनका परिचय कैस्टिलजो नाम के एक व्यक्ति ने लिख किया है, जिन्हें लंदन पेशेंट (मरीज) के रूप में जाना जाता है। वे बर्लिन पेशेंट के बाद एचआईवी से कार्यात्मक रूप से ठीक होने वाले दूसरे शख्स हैं।
रवींद्र गुप्ता कौन हैं। रविंद्र गुप्ता उर्फ रवि गुप्ता क्लिनिकल माइक्रोबायोलॉजी के प्रोफेसर हैं, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में क्लिनिकल साइंस में वेलकम ट्रस्ट के वरिष्ठ फेलो हैं और दक्षिण अफ्रीका के डरबन में अफ्रीका स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान में पढ़ाते हैं।
गुप्ता ने 1997 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से मेडिकल की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने 2001 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से क्लिनिकल में डिग्री प्राप्त की और हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में वर्ष 1998-1999 में पब्लिक हेल्थ में मास्टर पूरा किया। बाद में उन्होंने ऑक्सफोर्ड और द हॉस्पिटल फॉर ट्रॉपिकल डिजीज में संक्रामक रोगों के बारे में प्रशिक्षण हासिल लिया।
रवींद्र गुप्ता की उपलब्धि क्या है?
एडम कॉस्टिलजो ने टाइम मैग्जीन में गुप्ता के बारे में एक संक्षिप्त विवरण में लिखा, "मैं बहुत भाग्यशाली और विनम्र हूं कि उन्हें जान पाया, और यह देख पाया कि उसका समर्पण कैसे इस बीमारी को जीत सकता है।" लंदन पेशेंट के रूप में जाने जानेवाले कास्टिलजो एचआईवी के कार्यात्मक रूप से ठीक होने वाले दूसरे व्यक्ति हैं।
इन दोनों मरीजों के ठीक होने और इस मील के पत्थर को हासिल करने के लिए संक्रमित रोगियों को बोन-मैरो ट्रांसप्लांट (अस्थि-मज्जा प्रत्यारोपण) का उपचार दिया गया। लेकिन इस ट्रांसप्लांट का मकसद मरीजों में कैंसर का इलाज करना था, न कि एचआईवी।
न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक 2007 में एक चिकित्सा सम्मेलन में, एक जर्मन चिकित्सक ने "बर्लिन पेशेंट" में इस तरह के पहले इलाज के बारे में बताया था, जिसे बाद में 52 वर्षीय टिमोथी रे ब्राउन के रूप में पहचाना गया, जो अब कैलिफोर्निया के पाम स्प्रिंग्स में रहते हैं। नए रोगी ने गुमनाम रहना पसंद किया है, और वैज्ञानिकों ने उसका जिक्र सिर्फ "लंदन पेशेंट" के रूप में किया है।