ईरान के राष्ट्रपति चुनाव में कट्टरपंथी नेता इब्राहिम रईसी की जीत के लिए अमेरिका में बहुत से जानकार पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को दोषी ठहरा रहे हैं। उन्होंने ध्यान दिलाया है कि जब ट्रंप ने अमेरिका को 2015 की परमाणु डील से अलग करते हुए ईरान पर फिर से सख्त प्रतिबंध लगा दिए, तभी ये संकेत मिलने लगे थे कि इसका लाभ ईरान के कट्टरपंथी उठाएंगे। इन जानकारों के मुताबिक प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा गई, जिससे लोगों की जिंदगी मुहाल हुई। उसका लाभ अब रईसी को मिला है।
टीवी चैनल ने सीएनएन ने अपने एक विश्लेषण में ध्यान दिलाया है कि जब ट्रंप ने वो एलान किया, तभी एक अमेरिका में रहने वाले एक ईरानी मूल के बुजुर्ग ने सीएनएन से कहा था कि ट्रंप प्रशासन ने ईरान के कट्टरपंथियों को नया जीवनदान प्रदान कर दिया है। वो बुजुर्ग ईरान में इस्लामी क्रांति होने के बाद भाग कर अमेरिका आए थे। जब 2015 में परमाणु डील हुई, तो उनके जैसे लोगों की राय बनी थी कि इससे ईरान में सुधारों का रास्ता खुलेगा।
विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि ईरान में 2017 के राष्ट्रपति चुनाव में सुधारवादी हसन रूहानी भारी बहुमत से दोबारा ईरान के राष्ट्रपति चुने गए थे। इसे परमाणु डील के प्रति ईरान के लोगों के भारी समर्थन के रूप में देखा गया था। इस डील पर 2015 में अपने पहले कार्यकाल में रूहानी ने ही दस्तखत किए थे। लेकिन जब ट्रंप प्रशासन इस डील से अलग हो गया, तो ईरान के लोगों ने रूहानी की नीति को नाकाम मानना शुरू कर दिया। इससे सुधारवादियों की साख खत्म हुई।
सीएनएन की रिपोर्ट में बताया गया है कि ट्रंप के समझौते से हटने के पहले ईरान ने डील पर फिर से बातचीत करने का विकल्प खुला रखा था। इस रिपोर्टे के मुताबिक खुद अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने ये बात मानी है। लेकिन ट्रंप प्रशासन ने बिना इस पर गौर किए डील से अमेरिका को अलग कर लिया। उसके बाद ईरान पर ऐसे प्रतिबंध लगा दिए गए, जिससे वहां खाने-पीने की चीजों और दवाइयों तक की कमी हो गई। यूरोपीय देश इन प्रतिबंधों को बेअसर बनाने में नाकाम रहे।
उधर पिछले साल ट्रंप ने ईरान के सर्वाधिक सम्मानित जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या का आदेश दे दिया। इससे भी ईरान में कट्टरपंथियों के लिए समर्थन बढ़ा। इस वर्ष सत्ता में आने के बाद नए राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी ईरान डील को फिर से जिंदा करने में तेजी नहीं दिखाई। विश्लेषकों का कहना है कि अगर ऐसा हुआ होता, तो उससे ईरान में सुधारवादियों की ताकत बढ़ती।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक मुमकिन है कि इन हालात ने ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह अली खामनेई का इस बार राष्ट्रपति पद पर किसी कट्टरपंथी नेता को लाने का इरादा पक्का किया हो। गौरतलब है कि ईरान की गार्जियन परिषद ने उन तमाम मजबूत उम्मीदवारों के दावों को खारिज कर दिया, जो चुनाव में इब्राहिम रईसी को चुनौती दे सकते थे। हालांकि इस बार मतदान प्रतिशत बेहद कम रहा, लेकिन पड़े वोटों के बीच रईसी लगभग 60 फीसदी मत पाकर पहले ही दौर में चुनाव जीतने में सफल हो गए। इससे ईरान परमाणु डील के लिए नई समस्याएं पैदा हो गई हैं।