अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने समझौते की समयसीमा तय करते हुए ईरान को तबाह करने की चेतावनी दी है। इस बीच उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के 'गुप्त हथियारों' वाले बयान के बाद परमाणु युद्ध की आशंका जताई गई, जिस पर व्हाइट हाउस ने सफाई देते हुए परमाणु हमले से इनकार किया है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस डेडलाइन के खत्म होने पर टिकी हैं।
क्या ईरान के खिलाफ अमेरिका अब निर्णायक युद्ध लड़ने जा रहा है? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि आज ईरान की पूरी सभ्यता खत्म हो जाएगी। इस बयान के बाद पूरी दुनिया की सांसें थमी हुई हैं। वॉशिंगटन से लेकर तेहरान तक युद्ध की बातें हो रही हैं। ट्रंप के इस रुख ने उन अटकलों को हवा दे दी है कि क्या अमेरिका, ईरान पर परमाणु हमला करने की योजना बना रहा है?
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जेडी वेंस के बयान ने मचाई खलबली
इस बीच अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि हमारे तरकश में ऐसे कई हथियार हैं, जिनका इस्तेमाल हमने अब तक नहीं किया है। वेंस के इस बयान को सीधे तौर पर 'परमाणु हमले' की धमकी के रूप में देखा जा रहा है।
व्हाइट हाउस की सफाई
लेकिन जैसे ही परमाणु हमले की खबरें फैलने लगीं, व्हाइट हाउस ने तुरंत मोर्चा संभाला। व्हाइट हाउस की ओर से वेंस के बयान पर सफाई दी गई है। अमेरिकी प्रशासन ने उन लोगों को मूर्ख बताया है जो इसे परमाणु युद्ध से जोड़ रहे थे। व्हाइट हाउस की ओर से कहा गया कि उपराष्ट्रपति की बातों का मतलब परमाणु हमला बिल्कुल नहीं था। जानकारों का मानना है कि 'तरकश के नए हथियारों' से प्रशासन का इशारा शक्तिशाली बंकर बस्टर बमों या बड़े स्तर के साइबर हमलों की ओर हो सकता है। यह ईरान के पूरे सिस्टम को एक झटके में ठप कर सकता है।
क्या है विवाद की असली जड़?
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन और ईरान के बीच यह गतिरोध पिछले कई हफ्तों से चरम पर है। ट्रंप चाहते हैं कि ईरान न केवल अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह बंद करे, बल्कि क्षेत्रीय युद्धों में दखल देना भी बंद करे। वहीं, ईरान का रुख भी बेहद सख्त है। तेहरान ने साफ कर दिया है कि वह दबाव में आकर किसी भी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेगा।
अमेरिकी समय अनुसार, मंगलवार रात 8 बजे की डेडलाइन जैसे-जैसे करीब आ रही है, खाड़ी देशों में सैन्य हलचल बढ़ गई है। अगर ट्रंप अपनी चेतावनी पर अमल करते हैं, तो इसका असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और तेल की कीमतों पर इसका विनाशकारी असर पड़ सकता है।