COP27 : जलवायु परिवर्तन से जुड़े मुद्दों को लेकर जारी गतिरोध के बीच मिस्र में आयोजित कॉप27 शिखर सम्मेलन की अवधि एक दिन के लिए बढ़ा दी गई है। ऐसा कार्बन न्यूनीकरण कार्यक्रम, नुकसान और क्षति और जलवायु से जुड़े वित्तपोषण जैसे प्रमुख मुद्दों पर जारी गतिरोध को खत्म करने के प्रयास के तहत किया गया है।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र जलवायु वार्ता की अवधि एक दिन और बढ़ा दी गई है। कॉप27 को शुक्रवार को समाप्त होना था, लेकिन कॉप27 को शुक्रवार को समाप्त होना था, लेकिन यहां जारी वार्ता को उनके तार्किक अंत की ओर ले जाने के लिए इसे एक दिन बढ़ा दिया गया है।
एक ब्लॉग पोस्ट में वार्ता की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि कार्बन न्यूनीकरण कार्यक्रम, अनुकूलन पर वैश्विक लक्ष्य, हानि और क्षति, और जलवायु से जुड़े वित्तपोषण के मामले सहित कई मुद्दों पर बातचीत की जा रही है, क्योंकि इन पर एक राय नहीं बनी है। उन्होंने कहा कि सीओपी एक पार्टी संचालित प्रक्रिया है और इसलिए प्रमुख मुद्दों पर सहमति महत्वपूर्ण है।
कार्यक्रम अवधि में एक दिन का यह विस्तार इसे ही हासिल करने की दिशा में एक प्रयास है। प्रमुख मुद्दों पर जारी गतिरोध को तोड़ने के प्रयास में यूरोपीय संघ के मुख्य वार्ताकार फ्रैंस टिम्मरमैन्स ने एक योजना प्रस्तावित की, जिसमें उत्सर्जन में कटौती के साथ हानि और क्षति को जोड़ा गया।
वार्ता की सफलता नुकसान और क्षति यानि जलवायु परिवर्तन-ईंधन वाली आपदाओं के कारण अपूरणीय विनाश के लिए एक कोष बनाए जाने पर टिकी है। इस फंड के बदले में यूरोपीय संघ का प्रस्ताव देशों को 2025 से पहले तक उत्सर्जन के चरम पर पहुंचने और न सिर्फ कोयला बल्कि सभी जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से घटाने के लिए कहता है। फंड के ब्योरे पर अगले साल काम किया जाएगा।
इस प्रस्ताव का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि चीन जैसे बड़े विकासशील देशों को इस कोष में योगदान देने की आवश्यकता होगी, क्योंकि इस कोष का आधार व्यापक होगा। इससे पहले दिन में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ने समझौते का एक औपचारिक मसौदा प्रकाशित किया था, लेकिन इसमें सभी जीवाश्म ईंधनों को चरणबद्ध तरीके से घटाने के भारत के आह्वान का कोई उल्लेख नहीं किया गया था।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह आश्चर्य की बात है कि सभी जीवाश्म ईंधनों को चरणबद्ध तरीके से कम करने का आह्वान, सीओपी का दूसरा सबसे चर्चित मुद्दा रहा, अमेरिका और यूरोपीय संघ सहित अधिकांश विकासशील देशों और कुछ विकसित देशों के इसका करने समर्थन के बावजूद इसे मसौदे में जगह नहीं मिली।
कुछ ने यह भी कहा कि यह भारत के एक बयान की तरह था- जो कोयले के उपयोग पर आलोचना से बचने का एक सामरिक कदम की तरह था, न कि उसका रुख था। मसौदे ने अनुकूलन निधि पुनःपूर्ति और जलवायु वित्तपोषण पर एक नए सामूहिक परिमाणित लक्ष्य जैसे प्रमुख मुद्दों पर बहुत कम प्रगति दिखाई।
यह प्रस्ताव अमीर देशों के लिए '2030 तक शून्य से भी कम कार्बन उत्सर्जन' प्राप्त करने की आवश्यकता और वैश्विक कार्बन बजट की उनकी अनुपातहीन खपत के संदर्भों को भी छोड़ देता है, यह कुछ ऐसा है जिस पर भारत जैसे विकासशील देशों और अन्य गरीब देशों ने मिस्र में शिखर सम्मेलन के दौरान जोर दिया है।