नेपाल में सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश चोलेंद्र शमशेर राणा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर चर्चा शुरू हो गई है, लेकिन देश में न्यायपालिका में जारी विवादों पर विराम नहीं लगा है। महाभियोग प्रस्ताव पर नेपाल की संसद में रविवार को चर्चा शुरू हुई। प्रस्ताव पेश करते हुए नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओइस्ट सेंटर) के नेता देव गुरुंग ने राणा को हटाने के पक्ष में 21 कारणों का जिक्र किया।
इन कारणों में एक यह आरोप है कि राणा भ्रष्टाचार में शामिल रहे हैं। उन्होंने गैर-कानूनी तरीकों से धन कमाया है। इस काम में उन्होंने अपने परिजनों और दूसरे जजों का इस्तेमाल बिचौलिये के रूप में किया। राणा फिलहाल निलंबित हैं। उनके भविष्य का फैसला अब संसद करेगी।
लेकिन इस बीच संविधान और कानून के जानकारों ने सवाल उठाया है कि जिन जजों, अधिकारियों, और राणा के परिजनों का जिक्र महाभियोग प्रस्ताव में हुआ है, उनका क्या होगा। 98 सांसदों की तरफ से पेश महाभियोग प्रस्ताव में ऐसे कई नामों का उल्लेख हुआ है। वरिष्ठ वकील और कॉन्स्टीट्यूशनल लॉयर्स फोरम के अध्यक्ष दिनेश त्रिपाठी ने अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘महाभियोग प्रस्ताव में किए गए दावों से पार्टियों और सांसदों के सामने नैतिक और वैधानिक दायित्व का सवाल खड़े हो गया है। उन्हें अब उन लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई करनी होगी, जिनके बारे में कहा गया है कि वे भ्रष्टाचार और अनुचित न्यायिक व्यवहार में शामिल हुए।’
राणा जनवरी 2020 में प्रधान न्यायाधीश बने थे। उसके बाद से सुप्रीम कोर्ट में सात जज नियुक्त हुए है। विभिन्न हाई कोर्ट में लगभग दो दर्जन जजों की नियुक्ति हुई है। जिला अदालतों में इससे भी ज्यादा संख्या में जज नियुक्त किए गए हैं। समझा जाता है कि अब इन सभी नियुक्तियों को लेकर संदेह खड़ा हो गया है।
राणा को लेकर विवाद सबसे पहले पिछले साल अक्तूबर में सामने आया था, जब सुप्रीम कोर्ट के 19 जजों ने उनके अधीन काम करने से इनकार कर दिया था। उसके बाद उन्होंने लॉटरी के जरिए मामलों की सुनवाई के लिए बेंच तय करना शुरू कर दिया। उन जजों ने आरोप लगाया था कि राणा सुनवाई के लिए मुकदमों के आवंटन में भेदभाव कर रहे हैं।
लगभग उसी समय देशभर के वकील भी राणा के खिलाफ लामबंद हो गए। उन्होंने अदालतों का बहिष्कार शुरू कर दिया। अब वकील इस बात से संतुष्ट हैं कि आखिरकार प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर चर्चा शुरू हो गई है। नेपाल बार एसोसिएशन के कोषाध्यक्ष रुद्र प्रसाद पोखारेल कहा- ‘यह कहना ठीक नहीं है कि संसद में सुनी-सुनाई बातों को लेकर महाभियोग प्रस्ताव लाया गया है। लेकिन अब सासंदों को उन लोगों पर भी कार्रवाई करनी होगी, जिनके बारे में खुद सांसदों का दावा है कि उन्होंने भ्रष्टाचार में राणा की मदद की। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो समझा जाएगा कि उन्होंने संसद में झूठ बोला।’
इस बीच संविधान विशेषज्ञों ने कहा है कि दरअसल नेपाल की न्यायपालिका में तुरंत बुनियादी सुधारों की जरूरत है। उनके मुताबिक समस्याएं व्यवस्थागत हैं, जिनका समाधान किसी एक या दो जज को हटा देने से नहीं हो सकता।