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जलवायु कार्रवाई: गरीब देशों को अमीरों से ज्यादा मदद दे रहा भारत, जरूरतमंदों को दिए 76.5 करोड़ डॉलर

Wed, 13 Dec 2023 06:41 AM IST
यशोधन शर्मा वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, दुबई

सार

पर्यावरण नीति से जुड़े थिंक टैंक ओवरसीज डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु कार्रवाई के लिए दूसरे देशों को मदद देने में भारत विश्व के शीर्ष 5 देशों में शामिल है।
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Climate change - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (कॉप-28) में दुनिया न तो जीवाश्म ईंधन का उपयोग क्रमशः कम करने पर सहमत हो पाई है और न गरीब देशों को जलवायु संकट से निपटने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता तय कर पाई। विकसित देश  जलवायु संकट से बचाने के लिए जहां अपने हिस्से का योगदान देने से भी हिचक रहे हैं, वहीं भारत दूसरे विकासशील देशों की खुलकर मदद कर रहा है।

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पर्यावरण नीति से जुड़े थिंक टैंक ओवरसीज डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु कार्रवाई के लिए दूसरे देशों को मदद देने में भारत विश्व के शीर्ष 5 देशों में शामिल है। 2022-23 के दौरान भारत ने 76.5 करोड़ डॉलर की मदद दी है। वहीं, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय संघ 2020 से   10,000 करोड़ डॉलर देने को बाध्य हैं, पर आज तक इस वादे को पूरा नहीं कर पाए।

मतभेदों के बीच लंबा खिंचेगा सम्मेलन
कॉप-28 का मंगलवार को अंतिम दिन था। लेकिन, जीएसटी मसौदे पर सभी देशों में सहमति न बनने पर यह लंबा खिंचेगा। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की आेर से कॉप की अध्यक्षता कर रहे सुल्तान अल जाबेर ने कहा, फिलहाल नए मसौदे पर काम चल रहा है। इसमें जीवाश्म ईंधन का भी उल्लेख होगा।
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इससे पूर्व मसौदे में जीवाश्म ईंधन का उपयोग समयबद्ध ढंग से खत्म करने की बात नहीं होने पर विकासशील देशों ने सामूहिक रूप से विरोध जताया। यूएई ने कहा कि वह हर हाल में जीवाश्म ईंधन को मसौदे में शामिल करना चाहता है। लेकिन, यह सभी 200 देशों पर निर्भर करता है कि वे इसके लिए सहमति दें।

विकासशील देशों पर दबाव
विकसित देश अपने हिस्से का योगदान देने के बजाय भारत, ब्राजील, चीन जैसे देशों पर दबाव बना रहे हैं कि वे औद्योगिक गतिविधियों में कमी लाएं व वैश्विक जलवायु कार्रवाई के लिए ज्यादा वित्तीय योगदान दें।

जीएसटी मसौदे को बताया निंदनीय
विकासशील देशों ने कॉप28 के तहत पेश ग्लोबल स्टॉकटेक (जीएसटी) मसौदे की निंदा की और कहा कि इसमें जीवाश्म ईंधन के उपयोग को धीरे-धीरे खत्म करने का जिक्र नहीं है लेकिन, कोयले के उपायोग पर कठोर भाषा का इस्तेमाल है। भारत जैसे देश ऊर्जा उत्पादन के लिए कोयले पर निर्भर हैं।

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