बच्चों को फ्री में कंप्यूटर सिखाती हैं परीवश
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एक दिन घर में काम करने वाली के बच्चों ने कम्प्यूटर की ओर इशारा करते हुए पूछा यह क्या है? यह कैसे चलता है? छोटे बच्चों की जिज्ञासा और स्कूल ना जाने पाने की उनकी विवशता ने परीवश फातिमा को अंदर तक झकझोर कर रख दिया।
उन्होंने घर के कोने में पड़े कम्प्यूटर को निकाला और उन बच्चों को सिखाना शुरू कर दिया। बस यहीं से उन्होंने एक नेक काम शुरुआत करने की ठानी। आसपास के घरों और मोहल्ले के उन बच्चों को, जो कम्प्यूटर क्लास नहीं जा सकते, उनसे धीरे-धीरे संपर्क कर बुलाना शुरू कर दिया और बन गई सबकी कम्प्यूटरवाली दीदी।
यह वही कंप्यूटरवाली दीदी है, जिसे एलयू में चांसलर सिल्वर मेडल मिला था। यह मेडल पढ़ाई के साथ-साथ सामाजिक कार्य में स्टूडेंट के योगदान के लिए दिया जाता है।
परी कहती हैं कि धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढऩे लगी और तीन बैच चलने लगे। इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए पैसा चाहिए था, पॉकेट मनी से जो बन पड़ता कर लेती थी। इस काम में मेरी बहन ने आर्थिक मदद दी। परीवश प्रोफेसर बनना चाहती हैं, क्योंकि उनका मानना है कि खुद कुछ बनने के बाद ही मैं औरों के लिए कुछ कर पाऊंगी।