लॉकडाउन के बाद चीनी स्कूलों में बच्चे
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चीन ने पश्चिमी देशों का प्रभाव अपने देशों पर रोकने के नाम पर शिक्षण संस्थानों में अंग्रेजी को नकारना शुरू कर दिया है। अब तक अंग्रेजी को चीन के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य में प्रभावी स्थान मिलता रहा है। उसे देश की खुली नीतियों का पर्याय माना जाने लगा था। लेकिन अब स्कूलों से ही इसे हटाने पर जोर दिया जा रहा है।
पश्चिमी प्रभाव से अपने नागरिकों को बचाने का तर्क देकर खुलेपन और विचारों की स्वतंत्रता खत्म करने में जुटा
शुरुआत शंघाई से हुई है, जहां शिक्षा अधिकारियों ने आरंभिक कक्षाओं के बच्चों की परीक्षा अंग्रेजी में करवाने से स्कूलों को रोक दिया है। इससे पहले प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूल में बच्चों के पाठ्यक्रम से विदेशों से आई किताबें हटाई गईं। इस वर्ष कॉलेजों में एडमिशन की परीक्षाओं से अंग्रेजी हटा दी गई है। विश्वविद्यालयों में भी विभिन्न विषयों में अंग्रेजी की मूल किताबों की जगह चीन में प्रकाशित किताबें जारी हो रही हैं। पत्रकारिता और संविधान से जुड़े विषयों पर इसका विशेष ध्यान रखा जा रहा है।
सरकारी किताबों की क्वालिटी खराब
कुछ विश्वविद्यालय प्रोफेसरों ने चीनी किताबों की नीति का विरोध किया है। उनके अनुसार सरकार द्वारा तैयार करवाई इन किताबों की शिक्षण सामग्री का स्तर खराब है। विशेषज्ञों के अनुसार इसकी वजह, विषय के जानकारों के बजाय सरकार द्वारा कम्युनिस्ट पार्टी के वफादारों से इन्हें तैयार करवाना है।
चीनी नागरिक मान रहे इसे रिवर्स गियर
सरकार की अंग्रेजी विरोधी नीति को चीनी नागरिक अच्छी भावना से उठाया कदम नहीं मान रहे। वे इसे पश्चिमी देशों के प्रभाव से दूर करने की जगह स्वतंत्र विचारों वाली दुनिया से दूर करने का प्रयास करार दे रहे हैं। कई लोग इसे रिवर्स गियर करार दे रहे हैं, उनका मानना है कि इससे चीन पिछड़ता चला जाएगा।
विचारधारा नियंत्रण और थोपने का प्रयास
कम्युनिस्ट पार्टी चीनी नागरिकों की विचारधारा बचपन से नियंत्रित करने के लिए यह कदम उठा रही है। यह बहुत कुछ 1960 के दशक जैसा है, जब चीन के ऐसा बंद देश था जहां वैश्विक विचार, सोच और खुलेपन के लिए जगह नहीं थी।