रूस पर हाल में लगाए गए ताजा अमेरिकी प्रतिबंधों को चीन ने अमेरिका के खिलाफ गोलबंदी मजबूत करने का मौका बना लिया है। उसने एलान किया है कि ताजा प्रतिबंधों का मुकाबला करने में वह रूस का पूरा साथ देगा। साथ ही उसने अमेरिका से कहा है कि वह प्रतिबंध लगाने का नजरिया बदले। गौरतलब है कि इसके पहले चीन ने अमेरिकी प्रतिबंधों को नकारते हुए ईरान से भी संबंध बढ़ाने का एलान किया था। उसने ईरान में बड़ा निवेश करने और उससे अपनी मुद्रा में व्यापार करने की घोषणा की थी।
चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वह एकतरफा प्रतिबंधों के इस्तेमाल का पुरजोर विरोध करता है। साथ ही उसने कहा कि वह अपने ‘सहयोगी देशों’ के साथ मिल कर प्रतिबंधों का असर कम करने के लिए काम करेगा। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन ने कहा- ‘चीन और रूस के बीच एक दूसरे के साथ व्यापक भागीदारी बनी हुई है। राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा के मामले में चीन और रूस एक दूसरे का समर्थन करेंगे।’ वांग वेनबिन ने कहा कि एकतरफा प्रतिबंध लगाना अमेरिका के दादागीरी वाले नजरिए का इजहार है। जबकि अमेरिका बराबरी और पारस्परिक सम्मान के आधार पर मतभेदों को दूर करने के मकसद को बेहतर तरीके से हासिल कर सकता है।
पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि इस मामले में पत्रकारों को संबोधित करने की जिम्मेदारी चीनी विदेश मंत्रालय ने वांग को दी, जबकि आम तौर पर ये भूमिका झाओ लिजियान निभाते हैं। वांग वरिष्ठ राजनयिक हैं, जो अमेरिका सहित कई देशों में उच्च राजनयिक पदों पर रह चुके हैं।
गौरतलब है कि इसी महीने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कई रूसी कंपनियों और अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाने के नए आदेश पर दस्तखत किए थे। इसके तहत अमेरिकी वित्तीय संस्थानों पर रूस के बॉन्ड खरीदने पर रोक लगा दी गई थी। आमतौर पर देश विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए विदेशी संस्थानों से इस रूप में कर्ज लेते हैं। इसके अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति ने दर्जनभर रूसी राजनयिकों को अमेरिका से निकालने का फैसला भी किया था।
ये कदम रूस के अमेरिकी कंपनियों और सरकारी विभागों पर कथित साइबर हमले और 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने की उसकी कथित कोशिशों के जवाब में उठाया गया। रूस ने भी इसके जवाब में कई अमेरिकी राजनयिकों को देश से निकाल दिया। उसके अलावा क्रेमलिन (रूसी राष्ट्रपति कार्यालय) के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा है कि अमेरिका के खिलाफ अभी और कदम उठाने पर विचार किया जा रहा है।
पर्येवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि चीन ने रूस के लिए अपने समर्थन को जो एलान किया है, वह सिर्फ जुबानी नहीं है। बल्कि जब अमेरिका हालिया प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रहा था, उस समय चीन और रूस ने आर्थिक सहयोग बढ़ाने के कई करार किए। उसी समय रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने बीजिंग की यात्रा की थी। उस यात्रा के दौरान उन्होंने चीन को आगाह किया था कि अमेरिका ने रूस और चीन दोनों की तकनीकी प्रगति को रोकने को अपना मिशन बना लिया है।
लावरोव ने कहा था कि इस अमेरिकी कोशिश का सही जवाब यह होगा कि अमेरिकी वित्तीय सिस्टम का इस्तेमाल कम से कम किया जाए। इसके लिए दुनिया भर के देशों को आयात-निर्यात संबंधी भुगतान का सेटलमेंट अपनी मुद्राओं में करना चाहिए।
जानकारों का कहना है कि चीन इस दिशा में पहले से ही काम कर रहा है। इसी मकसद से उसने अपनी डिजिटल करेंसी का प्रयोग शुरू किया है। साथ ही उसने रूस और ईरान सहित कई देशों से भुगतान का सेटलमेंट अपनी मुद्राओं के विनिमय से करने की शुरुआत की है। इसीलिए अमेरिका के खिलाफ उसके ताजा बयान को गंभीरता से लिया जा रहा है।