चीनी मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि चीन न केवल तिब्बती बच्चों को जबरन मंदारिन पढ़ा रहा है, बल्कि उनके हाथों में हथियार भी थमा रहा है। यहां तक कि उन्हें पीएलए में भी शामिल कर रहा है। हाल ही में एक युवा तिब्बती लड़की को पीपुल्स लिबरेशन आर्मी-एयर फोर्स (PLAAF) में शामिल कर उसे फाइटर जेट उड़ाने की ट्रेनिंग दी है।
23 साल की केलसांग पेड्रोन पहली तिब्बती महिला हैं, जिन्होंने चीन का फाइटर एयरक्राफ्ट उड़ाया है। चीनी मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक तिब्बत के लोखा शहर में जन्मी केलसांग पेड्रोन ने अपनी शिक्षा 2017 में बीजिंग तिब्बत मीडिल स्कूल में की, और उसके बाद चीन सरकार ने एयर फोर्स एविएशन यूनिवर्सिटी में दाखिला दिला दिया, जहां पेड्रोन ने मिलिट्री जहाज उड़ाने की ट्रेनिंग ली, जिसके बाद उन्हें अकेले ही फाइटर जेट उड़ाया। चीन का दावा है कि तिब्बती पुरुष पायलट 1970 के दशक के मध्य से ही चीनी सशस्त्र बलों का हिस्सा रहे हैं।
पूरी दुनिया में प्रोपेगेंडा फैलाता है चीन
चीनी मामलों के जानकारों का कहना है कि चीन की रणनीति है कि तिब्बत को मुख्यधारा में शामिल करने के नाम पर उन्हें भारत के खिलाफ तैयार किया जाए और जंग के हालात में तिब्बतियों को एलएसी पर भेजा जाए। चीन ने अपनी इस रणनीति के तहत प्रत्येक तिब्बती परिवार के एक सदस्य को सेना में भेजना अनिवार्य कर दिया है। चीन का यह कदम वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भारत के साथ बढ़ते तनाव के बीच आया है। भारत हजारों तिब्बती शरणार्थियों और निर्वासित तिब्बती सरकार का घर है, इनमें तिब्बत से निर्वासित बौद्ध आध्यात्मिक नेता दलाई लामा भी शामिल हैं। इससे पहले भी चीन एलएसी पर तैनाती के लिए पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) में तिब्बतियों का भर्ती अभियान शुरू कर चुका है।
जेएनयू के सेंटर फॉर चाइनीज एंड साउथ ईस्ट एशियन स्टडीज में असिस्टेंट प्रोफेसर राकेश कुमार कहते हैं कि चीन की कोशिश पूरी दुनिया में प्रोपेगेंडा फैलाने की होती है। चीनी भाषा में एक्सपर्ट राकेश कुमार के मुताबिक चीन दुनिया को यह दिखाना चाहता है कि वह तिब्बत को लेकर प्रोग्रेसिव है और वह तिब्बत को मुख्यधारा में शामिल करना चाहता है। पहली तिब्बती महिला पायलट को लेकर वह कहते हैं कि चीन कोई भी पॉलिसी लाने से पहले रोल मॉडल तैयार करता है, ताकि बाकी तिब्बती भी इसके लिए प्रेरित हों।
इसलिए कर रहा है तिब्बतियों की भर्ती
भारत के डिफेंस एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब 2020 के गलवान संघर्ष में कथित तौर पर मारे गए 38 चीनी सैनिकों के नामों का खुलासा हुआ तो, इनमें से आठ लोग तिब्बती थे और उनके नाम कमोबेश पिनयिन (लक्पा, त्सेरिंग, कलसांग) में तिब्बती नामों से मेल खाते थे। ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) के मुताबिक चीन तिब्बती युवाओं को भारत के खिलाफ एलएसी पर ऑपरेशन के लिए प्रशिक्षित कर रहा है और इस संबंध में नियमित अभ्यास भी किए जा रहे हैं। पीएलए में 7,000 सक्रिय तिब्बती सैन्यकर्मी हैं, जिनमें से लगभग 100 महिलाओं समेत लगभग 1,000 तिब्बती विशेष सेना इकाइयों में काम कर रहे हैं। वह कहते हैं कि चीन की सोच है कि लद्दाख जैसे उच्च हिमालयी इलाकों में तिब्बती लोग बेहतर कर सकते हैं, क्योंकि वे वहां के मौसम के अभ्यस्त होते हैं। वहीं सामान्य चीनी सैनिक को सांस लेने में दिक्कत और हाई एल्टीट्यूड सिकनेस जैसी समस्याएं आती हैं।
चीन मामलों के जानकार असिस्टेंट प्रोफेसर राकेश कुमार कहते हैं कि चीन युवाओं पर बहुत फोकस रखता है, क्योंकि वह युवाओं की अहमियत जानता है। वह उन्हें मंदारिन यानी चीनी भाषा सिखा रहा है और उन्हें चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी पर भरोसा करना सीखा रहा है। वह कहते हैं कि चीन के इस प्रोपेगंडा से तिब्बत के लोगों में चीन के प्रति भरोसा बढ़ेगा।
हिंदी और नेपाली जानने वालों को दे रहा है प्राथमिकता
ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस के मुताबिक चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र से सक्रिय रूप से तिब्बतियों और नेपालियों की भर्ती कर रही है, जो हिंदी और नेपाली जानते हों, ताकि एलएसी पर खुफिया जानकारी जुटा सकें। इसके लिए वे समय-समय पर चीन के कई कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का दौरा भी करते रहते हैं। पीएलए का पश्चिमी थिएटर कमांड एलएसी के आधे हिस्से को कंट्रोल करता है, और वह भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा से सटे इलाकों में हिंदी ग्रेजुएट्स की खोज के लिए विश्वविद्यालयों में भर्ती अभियान चला रहा है।
भारत की नकल करने की कोशिश
चीनी मामलों के जानकार रिटायर्ड कर्नल अनुपम का कहना है कि पीएलए में तिब्बतियों की भर्ती असल में भारत की नकल है। वह कहते हैं कि चीन ने तिब्बतियों को पीपुल्स लिबरेशन आर्मी में शामिल करने के प्रयास 2021 से शुरू किए, जब उसने देखा कि भारत के पास चीन से निर्वासित तिब्बतियों वाली एक खास स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (SFF) है, जिसने एलएसी पर चीनी आक्रमकता का जवाब देने के लिए पूर्वी लद्दाख के मोखपारी, ब्लैक टॉप समेत कई ऊंचाइयों पर कब्जा करने में अपनी काबिलियत दिखाई। एसएफफ के प्रदर्शन को देख कर चीन भी हैरान रह गया।
क्या है स्पेशल फ्रंटियर फोर्स?
स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (एसएफएफ) भारतीय सेना की एक यूनिट है, जिसमें मुख्य रूप से तिब्बती शरणार्थी भर्ती होते हैं। इसकी स्थापना 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद चीन के साथ एक और संघर्ष के हालात में चीन सीमा पर सीक्रेट मिशन चलाने के लिए की गई थी। इन सैनिकों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है, ये कई सीक्रेट मिशन में भी हिस्सा ले चुके हैं। एसएफएफ ने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम और कारगिल युद्ध में भी हिस्सा लिया था। एसएफएफ सीमावर्ती इलाकों में काम करती है, जिसमें चीन के खिलाफ ऑपरेशन भी शामिल हैं। उत्तराखंड के चकराता स्थित स्पेशल फ्रंटियर फोर्स की निगरानी सीधे रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) करती है। भारतीय सेना के मेजर जनरल रैंक से चयनित एसएफएफ के महानिरीक्षक सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय को रिपोर्ट करते हैं।