सिंगहुआ यूनिवर्सिटी में नेशनल स्ट्रेटेजी इंस्टीट्यूट के रिसर्च विभाग के निदेशक चियान फेंग ने चीन के सरकार समर्थक अखबार ग्लोबल टाइम्स से कहा कि रूस और चीन इस बात पर सहमत हैं कि वे अफगानिस्तान में अपनी फौज नहीं भेजेंगे। रूस को 1979 में तत्कालीन सोवियत संघ के अफगानिस्तान में फौज भेजने से हुए कटु अनुभव याद हैं।
चियान ने चीन की नीति को स्पष्ट करते हुए कहा कि अफगानिस्तान के मामले में अपने प्रभाव के कारण अमेरिका, चीन, रूस और पाकिस्तान मुख्य भूमिका वाले देश हैं। लेकिन उन्होंने कहा-‘अफगान मुद्दे पर बड़ी ताकतों का समन्वय सिर्फ एक बाहरी पहलू है। उससे अफगानिस्तान के भीतर मौजूद समस्याएं और विभिन्न शक्तियों के टकराव का हल नहीं निकाला जा सकता। इसलिए बड़ी ताकतों को अफगानिस्तान के अंदरूनी मामलों में सीधे दखल देकर मालिक की भूमिका नहीं निभानी चाहिए।’
पर्यवेक्षकों ने चीन के सरकारी मीडिया में छपी ऐसी टिप्पणियों को इस बात का संकेत माना है कि चीन तालिबान शासन पर प्रतिबंध लगाने जैसे कदमों का समर्थन नहीं करेगा। प्रतिबंध का सुझाव ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने दिया है। चीन इसके बजाय तालिबान से संपर्क बनाए रखने के रास्ते पर चलेगा, ताकि वह अपने रणनीतिक हितों को साध सके।