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आरसीईपी करार को चीन ने बताया अपनी जीत! क्या खत्म हो जाएगा अमेरिका का वर्चस्व!

Mon, 16 Nov 2020 04:54 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग

सार

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा- अगर चीन इस मामले में विजेता है, तो यह आरसीईपी में शामिल हुए दूसरे देशों के लिए भी विजय जैसी स्थिति ही है। इसलिए कि पिछले आठ साल की वार्ता में इन देशों ने भी अपने लिए फायदे की स्थिति बनाने की कोशिश की है। इसलिए करार में शामिल सभी देश विजेता हैं...
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क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी - फोटो : Amar Ujala (File)
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क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) करार पूरा होने पर चीनी मीडिया में जश्न जैसा माहौल देखने को मिला है। चीनी मीडिया का आम स्वर यह है कि अमेरिका को धता बताते हुए एशिया और प्रशांत के 14 देश ऐसे समझौते में शामिल हो गए हैं, जिसमें सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन की है। एक वर्चुअल सम्मेलन में रविवार को करार के संपन्न होने के बाद चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के अखबार ‘द ग्लोबल टाइम्स’ ने तुरंत एक संपादकीय प्रकाशित किया। इसमें उसने लिखा, अमेरिका और पश्चिमी शासक वर्ग अभी भी यह मानते हैं कि चीन आरसीईपी का सबसे बड़ा विजेता है। उनके भीतर चीन के खिलाफ ऐसे पूर्वाग्रह बैठे हुए हैं कि जब कभी चीन किसी चीज में शामिल होता है, तो उनका दिमाग दिग्भ्रमित हो जाता है।

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ग्लोबल टाइम्स ने लिखा- अगर चीन इस मामले में विजेता है, तो यह आरसीईपी में शामिल हुए दूसरे देशों के लिए भी विजय जैसी स्थिति ही है। इसलिए कि पिछले आठ साल की वार्ता में इन देशों ने भी अपने लिए फायदे की स्थिति बनाने की कोशिश की है। इसलिए करार में शामिल सभी देश विजेता हैं।

इसी अखबार ने हांगकांग सिटी यूनिवर्सिटी में कानून के प्रोफेसर वांग जियांगयू का लेख इस शीर्षक के साथ प्रकाशित किया- ‘आरसीईपी पश्चिम प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका का वर्चस्व खत्म कर देगा।’ वांग ने ध्यान दिलाया है कि अमेरिका का एशिया-प्रशांत क्षेत्र में वर्चस्व रहा है। अब नए समझौते के साथ पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया का आर्थिक एकीकरण हो जाएगा। इस करार से ये संदेश गया है कि एशियाई देशों के सामने अब अमेरिका या चीन में से किसी एक को चुनने की मजबूरी नहीं है।
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वांग ने ध्यान दिलाया है कि कई एशियाई देशों के मीडिया में आरसीईपी का स्वागत किया गया है। उनकी रिपोर्टों में इस बात का विश्लेषण है कि समझौते से कैसे क्षेत्रीय आर्थिक और व्यापार सहयोग बढ़ेगा और उससे कैसे उनके अपने देश को फायदा होगा। लेकिन पश्चिमी मीडिया में इस करार को “चीन के नेतृत्व वाला” कह कर संबोधित किया गया है। उनमें ये बताया गया है कि इससे चीन के प्रभाव में इजाफा होगा।

गौरतलब है कि आरसीईपी की पहल दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन आसियान ने की थी। कुल दस देश इस समूह में शामिल हैं। आसियान ने बाद में भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड को इसमें भागीदारी के लिए आमंत्रित किया। पिछले साल नवंबर में भारत ने इस करार के लिए जारी बातचीत से अलग हो जाने का फैसला किया था। इस बात ने पश्चिमी मीडिया का ध्यान खास तौर पर खींचा है कि चीन के साथ जापान और ऑस्ट्रेलिया इसमें शामिल हुए हैं। जबकि अपनी विदेश नीति में ये दोनों देश अमेरिका के करीबी हैं। साथ ही सुरक्षा और व्यापार मुद्दों को लेकर इनका चीन से तीखा टकराव चल रहा है।

आरसीईपी संपन्न होने की खबर पश्चिम मीडिया ने प्रमुखता दी है। उसमें ध्यान दिलाया गया है कि ये दुनिया का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार समूह होगा। इसमें आयात और निर्यात पर लगने वाले शुल्कों में 90 फीसदी कटौती हो जाएगी। आरसीईपी का विचार सबसे पहले अमेरिका के ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) के करार के जवाब में उभरा था।

टीपीपी में कई एशियाई देशों को शामिल किया गया था, लेकिन कई देशों को बाहर रखा गया था। जिन देशों को बाहर रखने का प्रस्ताव था, उनमें चीन भी है। इसको लेकर चीन में काफी नाराजगी थी। तब चीनी मीडिया में बार-बार इस बात का जिक्र हुआ था कि चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और ज्यादातर एशियाई देशों का सबसे बड़ा व्यापार भागीदार है। चीन ने माना था कि इसके बावजूद उसे बाहर रखने के पीछे कारण राजनीतिक और सामरिक हैं।

चीनी मीडिया ने इसे चीन के प्रभाव को नियंत्रित रखने की कोशिश में देखा था। लेकिन डॉनल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका को टीपीपी से बाहर कर लिया। इसके साथ ही ये करार बीच में ही नाकाम हो गया। अब चीन उससे बड़े करार में शामिल हो गया है, जिस पर उसके मीडिया में खुशी का माहौल है।  

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