राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने रविवार को कहा कि वह कर्ज के बोझ से दबे देश की अर्थव्यवस्था को दर्द निवारक दवाएं देकर नहीं, बल्कि बीमारी के मूल कारण का इलाज करके ठीक कर रहे हैं। राष्ट्रपति विक्रमसिंघे ने श्रीलंका के 75वें स्वतंत्रता दिवस के एक दिन बाद ये टिप्पणियां कीं।
विदेशी मुद्रा भंडार में भारी कमी के कारण श्रीलंका अभूतपूर्व वित्तीय संकट से जूझ रहा है। पिछले साल इसकी वजह से द्वीप राष्ट्र में राजनीतिक उथल-पुथल भी हुई थी, जिसके कारण ताकतवर राजपक्षे परिवार को सत्ता से बेदखल किया गया था।
विक्रमसिंघे ने ट्वीट में कहगा, मैं दर्द निवारक दवाओं से इलाज नहीं कर रहा हूं। मैं बीमारी की मूल वजह का इलाज कर रहा हूं। मुझे जो फैसले लेने के लिए मजबूर किया गया है, उनमें से कई अलोकप्रिय हैं, लेकिन इनकी वजह से कोई भी नागरिक कतारों में नहीं मरेगा या भूखा नहीं रहेगा।
पिछले साल अप्रैल से जुलाई तक श्रीलंका में अराजकता चरम पर थी, ईंधन स्टेशनों पर मीलों लंबी कतारें लग गईं और गुस्साए लोगों ने सड़कों को अवरुद्ध कर दिया था। श्रीलंका पर 51 अरब डॉलर से ज्यादा का विदेशी कर्ज है, जिसके कारण उसने पिछले साल खुद को डिफॉल्ट घोषित किया था।
उन्होंने ट्वीट में कहा, बाधाओं के बावजूद मैं सुधारों को जारी रखूंगा। अगर हम एकजुट और योजनाबद्ध तरीके से काम करें तो हम 2048 तक एक विकसित देश बन सकते हैं। सच्ची आजादी हासिल की जा सकती है और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी एक नए देश का निर्माण करना है, जहां हमारे बच्चे बाकी दुनिया के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें।
एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा, जब हम अपनी आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं और देश की आजादी के लिए कड़ी मेहनत करने वालों का सम्मान कर रहे हैं, तो आइए हम उस आजादी को फिर से हासिल करने पर ध्यान केंद्रित करें जो हमने आज खो दी है। विक्रमसिंघे ने अफसोस जताया कि राजनेताओं ने निवेश के लिए नहीं, बल्कि उपभोग के लिए कर्ज लिया, जो श्रीलंका की अर्थव्यवस्था के पतन का कारण था। उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया।