वेबसाइट विकिलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे के मामले में ब्रिटिश कोर्ट के आए फैसले से दुनियाभर के मानव अधिकार कार्यकर्ताओं और अभिव्यक्ति की आजादी के समर्थकों ने राहत महसूस की है। इसके बावजूद हकीकत यह है कि असांजे को अमेरिका प्रत्यर्पित कराने की कोशिशों पर अभी पूर्ण विराम नहीं लगा है। अभी सिर्फ इतना हुआ है कि ब्रिटेन की एक अदालत ने असांजे की मानसिक स्थिति के मद्देनजर प्रत्यर्पण की अमेरिकी अर्जी ठुकरा दी है।
मानवाधिकार कार्यकर्ता और बड़ी संख्या में राजनीतिक संगठन महीनों से असांजे के पक्ष में मुहिम चला रहे थे। कुछ समूहों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से असांजे को क्षमादान देने की अपील भी की थी। लेकिन ट्रंप ने आरंभिक संकेत देने के बावजूद ऐसा नहीं किया। असांजे के मामले में ताजा फैसला ओल्ड बेली के डिस्ट्रिक्ट जज ने दिया। लेकिन खबर है कि इस फैसले के खिलाफ अमेरिका अपील करेगा। इस तरह मामले की ब्रिटेन के सुप्रीम कोर्ट में पूरी सुनवाई का रास्ता खुल जाएगा। वहां कई ऐसे तकनीकी पहलू उठ सकते हैं, जिसमें असांजे के बचाव पक्ष को मुश्किल पेश आ सकती हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक अगर सुप्रीम कोर्ट में हार हुई तो असांजे के बचाव पक्ष के वकीलों के पास एक विकल्प मामले को यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स के पास ले जाने का बचेगा। इस कोर्ट का फैसला आमतौर पर मानवाधिकारों के पक्ष में रहता है। अगर यहां असांजे की जीत हुई, तो उनकी रिहाई का रास्ता भी खुल सकता है। इसके बावजूद आशंका यह है कि अमेरिका अपनी ताकत का इस्तेमाल कर दुनिया या यूरोप में उनकी मुक्त आवाजाही के रास्ते में रुकावटें खड़ी कर सकता है।
इस बीच ब्रिटेन का फैसला आते ही मेक्सिको के राष्ट्रपति आंद्रे मैनुएल लोपेज ओब्रादोर ने असांजे को पनाह देने की पशकश कर दी। उन्होंने कहा कि वे अपने विदेश मंत्रालय के अधिकारियों से ब्रिटेन से संपर्क करने को कहेंगे, ताकि असांजे की रिहाई की संभावना का पता लगाया जा सके। अगर उनकी रिहाई हो जाती है, तो उन्हें मेक्सिको में शरण दे दी जाएगी। संभावना है कि कई और देश ऐसी पेशकश कर सकते हैं। खासकर ऐसे प्रस्ताव लैटिन अमेरिकी देशों की तरफ से आ सकते हैं। गौरतलब है कि असांजे ने लगभग छह साल तक लंदन स्थित इक्वाडोर के दूतावास में पनाह ले रखी थी।
असांजे समर्थकों को आशंका है कि अमेरिका में जो बाइडन के राष्ट्रपति बनने के बाद विकिलीक्स मामले में अमेरिका की नीति अधिक सख्त हो जा सकती है। बाइडन ने 2010 में असांजे को हाई टेक आतंकवादी कहा था। तब बाइडन उप राष्ट्रपति थे। ट्रंप की नीति इस मामले में अधिक नरम रही है। इसलिए एक कयास यह भी लगाया जा रहा है कि अपने कार्यकाल के बचे समय में ट्रंप मुमकिन है कि असांजे को क्षमादान दे दें। ब्रिटिश कोर्ट के फैसले के बाद उनके लिए ऐसा करना अधिक आसान हो गया है।
असांजे ने 2006 में विकिलीक्स वेबसाइट बनाई थी। 2007 से उन्होंने अमेरिका और बहुत से दूसरे देशों के गोपनीय दस्तावेजों को जारी करना शुरू कर दिया। इससे दुनिया में बहुत हलचल मची थी। अमेरिकी सरकार के लिए उससे बेहद असहज स्थिति पैदा हुई थी। तभी अमेरिका की पहल पर उनकी गिरफ्तारी का वारंट जारी हुआ था। तब असांजे ने लंदन स्थित इक्वाडोर के दूतावास में पनाह ले ली। इसको लेकर ब्रिटेन और इक्वाडोर के बीच राजनयिक टकराव पैदा हो गया।
ये गतिरोध 2019 में दूर हुआ जब इक्वाडोर ने असांजे को दी गई राजनीतिक पनाह को खत्म कर दिया। उसके बाद से वे ब्रिटेन की हिरासत में हैं। तभी से उनके खिलाफ ब्रिटिश कोर्ट में प्रत्यर्पण का मामला चल रहा था। इस मामले में एक मुकाम पर असांजे की जीत हुई है। लेकिन अभी ये मामला खत्म नहीं हुआ है। प्रत्यर्पण की तलवार अब भी उन पर लटक रही है।