पंजशीर घाटी में तालिबान से मोर्चा ले रहे धड़े का नेतृत्व कर रहे पूर्व उपराष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह ने ऐलान किया है कि चाहे जान देनी पड़े, लेकिन वह घुटने नहीं टेकेंगे। सालेह ने ब्रिटिश अखबार डेली मेल के लिए लिखे एक लेख में कहा, तालिबान के कब्जे वाला अफगानिस्तान अब पाकिस्तान का उपनिवेश बन चुका है।
आलीशान होटलों से विरोध की अपील
पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी और अन्य अधिकारियों पर कटाक्ष करते हुए सालेह ने कहा, वे विदेश में शाही होटल और विला से यहां के गरीब लोगों से तालिबान का मुकाबला करने की अपील करते हैं। भले ही वे कहें कि अफगानिस्तान में रुकते तो शहीद हो चुके होते। लेकिन इसमें बुराई क्या है?
अहमद मसूद ने दिया साथ
आखिर में सालेह ने अहमद मसूद से मदद मांगी। मसूद ने बताया वह काबुल में ही है और रणनीति पर काम कर रहे हैं।
गार्ड से कहा था- घायल हो जाऊं तो सिर में गोली मार देना, बोले- घुटने नहीं टेकेंगे
काबुल से निकलते वक्त मैंने गार्ड रहीम को कुरान की कसम दी कि अगर लड़ाई में मैं घायल हो जाऊं तो बेझिझक मेरे सिर में दो गोलियां मार देना, क्योंकि मैं तालिबान के सामने घुटने टेकने की बजाय मरना पसंद करूंगा।
हमने बड़ी मुश्किल से उत्तरी दर्रा पार किया। दो बार हमले हुए, लेकिन पंजशीर पहुंच गए। यहीं पर अहमद मसूद से मुलाकात हुई और तालिबान के विरोध की रणनीति तय की।
पश्चिम देश अपनी इज्जत बचाएं
सालेह ने लिखा, पश्चिमी देश तालिबान के साथ समझौते की बातें कर रहे हैं। मैं पश्चिम देशों से इतना ही कहूंगा कि हमें सिर्फ नैतिक समर्थन से काम नहीं चलने वाला, प्रत्यक्ष मदद करनी होगी। तालिबान के साथ राजनीतिक समझौते के जरिए दबाव डाला जा सकता है, जिससे अफगान लोगों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का समर्थन मिले।