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ज्वालामुखी के अंदर हजारों फुट गहरा बोरिंग!

Sun, 11 Sep 2016 01:54 PM IST
बीबीसी
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इटली - फोटो : BBC
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इटली का एक शहर है नेपल्स की खाडी के किनारे बसा ये शहर, ज्वालामुखियों वाला शहर कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इस शहर के करीब है इटली का बदनाम ज्वालामुखी, माउंट विसूवियस ये एक सक्रिय ज्वालामुखी है। सिर्फ यही नहीं, नेपल्स के तट के करीब समंदर के भीतर एक भयानक ज्वालामुखी है। इसका नाम है, कैम्पी फ्लेग्री।
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कैम्पी फ्लेग्री, एक ऐसा ज्वालामुखी है, जिसके एक दो नहीं कई मुंह हैं। और ये समंदर के भीतर है। माना जाता है कि इसकी कोख में अभी भी भयंकर आग धधक रही है। और ये कभी भी फट सकता है। इससे नेपल्स शहर के तबाह होने का खतरा है। कोई ज्वालामुखी कब फटेगा, इसकी भविष्यवाणी करनी मुश्किल है। लेकिन अब वैज्ञानिक इस कोशिश में हैं कि इसका कोई तोड निकाला जाए। इसके लिए नेपल्स शहर में कोशिशें शुरू हुई हैं। समंदर के भीतर छुपे कैम्पी फ्लैग्री, ज्वालामुखी के भीतर झांकने की कोशिश हो रही है।

एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है, जिसका नाम है कैम्पी फ्लैग्री डीप ड्रिलिंग प्रोजेक्ट। इसका मकसद है, ज्वालामुखी के अंदर 10 हजार फुट तक की बोरिंग करना। इटली के जियोलॉजिस्ट स्टीफानो कार्लिनो, इस मिशन में शामिल हैं। मिशन के लोगों ने नेपल्स शहर के बार एक पुरानी फैक्ट्री के कैम्पस में एक बोरवेल बनाया है, जिसके जरिए ज्वालामुखी के भीतर बोरिंग करके झांकने का इरादा है।
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कैम्पी फ्लैग्री के बारे में कहा जाता है

इटली - फोटो : BBC
कैम्पी फ्लैग्री के बारे में कहा जाता है कि ये दुनिया के सबसे खतरनाक ज्वालामुखियों में से एक था। इसमें आखिरी विस्फोट आज से पंद्रह हजार साल पहले हुआ था। वैज्ञानिक दावा करते हैं कि ये इतने भयानक विस्फोट थे कि इससे दुनिया का मौसम बदल गया। माना जाता है कि इंसानों के रिश्तेदार कहे जाने वाले नियंडरथल मानव, कैम्पी फ्लैग्री में 39 हजार साल पहले हुए विस्फोट की वजह से ही खत्म हुए। सोलहवीं सदी में यानी 1538 में भी इसमें एक छोटा सा विस्फोट हुआ था।

यानी पिछले करीब पांच सौ सालों से ये ज्वालामुखी शांत है। लेकिन कब के फट पडेगा और आग उगलने लगेगा कहना मुश्किल है। इसीलिए नेपल्स शहर के पास ही स्थित वेधशाला से माउंट विसूवियस और कैम्पी फ्लैग्री पर लगातार निगरानी होती रहती है। ताकि अगर किसी ज्वालामुखी में विस्फोट का डर हो, तो लोगों को वक्त रहते आगाह किया जा सके।

नेपल्स शहर के आस पास जमीन के अंदर लगातार उठा-पटक चलती रहती है। शहर का ऊबड-खाबड धरातल इस बात की गवाही देता है। अभी 1982 से 1984 के बीच पास का ही एक कस्बा पोजुली, करीब दो मीटर तक ऊपर उठ गया था। दहशत के मारे लोग कस्बा छोडकर भाग गए थे। कई लोग तो फिर वापस नहीं आए।

कैम्पी फ्लैग्री में विस्फोट होने वाला है

इटली - फोटो : BBC
जब ऐसा हो रहा था तो वैज्ञानिकों को लगा कि कैम्पी फ्लैग्री में विस्फोट होने वाला है। मगर कुछ सालों बाद धरती अपने आप शांत हो गई। इससे साफ हो गया कि कुदरत के बहुत से कारनामे, इंसान की समझ से परे हैं। इसी चीज को परखने के लिए स्टीफनो कार्लिन और ब्रिटेन के वैज्ञानिक क्रिस्टोफर किलबर्न ने कैम्पी फ्लैग्री की बोरिंग का प्रस्ताव 2008 में रखा था। उस वक्त इसे मंजूरी भी मिल गई।

मगर जब तक पैसे मिलते, सामान जमा होता, मीडिया मे हंगामा बरपा हो गया। एक स्थानीय वैज्ञानिक बेनेडेटो डे विवो ने इसे 'रेसिपी ऑफ डिजैस्टर' या तबाही का मिशन बताकर इस पर तुरंत रोक लगाने की मांग कर दी।

बेनेडेटो डे विवो का कहना था कि कैम्पी फ्लैग्री के भीतर अभी भी आग धधक रही है ये तो तय है। अगर इसमें बोरिंग की गई तो जबरदस्त विस्फोट के जरिए लावा बाहर आने का डर है।

हालांकि स्टीफेनो और किलबर्न का मानना है कि इसकी आशंका कम ही है। मगर बेनेडेटो कहते हैं कि कोई ये पक्के तौर पर नहीं कह सकता है कि ऐसा नहीं होगा। किलबर्न और कार्लिन भी इसकी गारंटी नहीं ले सकते। ऐसे में इस खतरे को उठाने की जरूरत नहीं। इसके बाद कई सालों तक ज्वालामुखी की बोरिंग के इस प्रोजेक्ट पर रोक लगी रही।
 

ज्वालामुखी की बोरिंग का पायलट प्रोजेक्ट फिर से शुरू

इटली - फोटो : BBC
एक साल तक ये नोक-झोंक चलती रही। फिर नेपल्स शहर के लोगों ने एक नया मेयर चुना, जिसने स्टीफेनो और किलबर्न के प्रोजेक्ट को एक बार फिर से हरी झंडी दे दी। इसी के बाद शहर के बाहर वीरान पडी एक फैक्ट्री में बोरवेल बनाकर, ज्वालामुखी की बोरिंग का पायलट प्रोजेक्ट फिर से शुरू किया गया है।

वैसे ड्रिलिंग कोई आसान काम नहीं। आज अंतरिक्ष में जहां इंसान ने अरबों किलोमीटर का फासला तय कर लिया है, वहीं जमीन के अंदर बोरिंग में उसे ज्यादा कामयाबी नहीं मिली है। धरती की कोख में झांकने की ज्यादातर कोशिशें नाकाम रही हैं।

आज तक अगर इंसान ने धरती के भीतर सबसे गहरी खुदाई की है, तो, वो बारह किलोमीटर से थोडी ही ज्यादा गहराई तक जा सका है। इसके बाद भयंकर गर्म तापमान की वजह से खुदाई का काम आगे नहीं बढ सका है।

साठ के दशक में अमरीका ने प्रोजेक्ट मोहोल के जरिए समंदर की गहराई में खुदाई शुरू की थी। ये प्रोजेक्ट सिर्फ 183 मीटर अंदर तक जा सका। इसके खर्च को देखते हुए अमरीकी संसद ने प्रोजेक्ट पर रोक लगा दी थी।

इसके बंद होने के चार साल बाद सोवियत वैज्ञानिकों ने धरती के भीतर खुदाई की कोशिश शुरू की। करीब बीस बरस की मशक्कत के बाद सोवियत वैज्ञानिक 12 हजार 262 मीटर की गहराई तक जाने में कामयाब हुए। 1992 में ये खुदाई भी 180 डिग्री तापमान से सामना होने के चलते रोकनी पडी।
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इटली - फोटो : BBC
इक्कीसवीं सदी में जापान का ड्रिलिंग जहाज चिक्यू समंदर के भीतर करीब दो किलोमीटर की गहराई तक ड्रिलिंग कर चुका है। वैसे अमरीका के करीब, समंदर में तेल की खोज में डीपवाटर होराइजन नाम के मिशन के तहत खुदाई की गई थी। मगर वहां से भारी मात्रा में तेल निकलकर समंदर में फैल गया था। जिसके बाद उसका मुंह बंद करने में ही महीनों लग गए।

धरती के भीतर खुदाई में बडी मशीनें चाहिए। ढेर सारा पैसा चाहिए। इसमें खतरे भी बहुत हैं। इसी वजह से कैम्पी फ्लैग्री ज्वालामुखी की बोरिंग के मिशन को लेकर वैज्ञानिकों में आम राय नहीं है। मगर स्टीफेनो और किलबर्न को लगता कि कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं है।

कैम्पी फ्लैग्री जैसे ज्वालामुखियों में विस्फोट की भविष्यवाणी करने के लिए जरूरी है कि उनके अंदर झांक कर देखा जाए। किलबर्न मानते हैं कि इसमें खतरा है। मगर, बिना खतरा मोल लिए कोई काम हो नहीं सकता।

वैसे नेपल्स के लोगों को इस बात से कोई फर्क नहीं पडता कि उनके आस-पास दो भयंकर ज्वालामुखी हैं। वो इस बात से भी बेपरवाह हैं कि ज्वालामुखी की बोरिंग में कितना जोखिम है। वो तो अपनी मस्त जिंदगी जीने में व्यस्त हैं।

इधर, स्टीफेनो और क्रिस्टोफर किलबर्न की टीम, कैम्पी फ्लैग्री के भीतर झांकने के लिए संसाधन और आत्मविश्वास जुटा रही है। हमारी शुभकामनाएं उनके साथ हैं।
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