बांग्लादेश में महीनों से सुलग रही आरक्षण और सरकार विरोधी चिंगारी सोमवार को भीषण आग के रूप में फूटी। 300 लोगों की मौत के बाद देशभर से प्रदर्शनकारियों ने सोमवार को राजधानी ढाका तक चीनी कम्युनिस्ट क्रांति के अंदाज में लॉन्ग मार्च का एलान किया और सेना भी उग्र भीड़ को संभाल नहीं पाई। नतीजा यह रहा कि करीब डेढ़ दशक से बांग्लादेश की सत्ता पर काबिज शेख हसीना को जान बचाकर देश से भागना पड़ा है।
बांग्लादेश में उथल-पुथल व तख्तापलट का इतिहास
1975 देश के पहले
हसीना के पिता, प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर रहमान की उनके परिवार के ज्यादातर सदस्यों की हत्या। इसी वर्ष दो और तख्तापलट हुए। जनरल जियाउर रहमान ने सत्ता पर कब्जा किया।
विलेन क्यों बनीं हसीना
■ 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में शामिल लोगों के वंशजों को मिल रहे आरक्षण को खत्म करने के लिए छात्र मांग कर रहे हैं। इसी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। वांग्लादेश मुक्ति संग्राम में शामिल रहे लोगों के वंशजों को 30 फीसदी आरक्षण दिया जाता है। 10 फीसदी आरक्षण महिलाओं के लिए भी है।
■ अल्पसंख्यकों को धर्म के आधार पर 5% व विकलांगों को एक फीसदी आरक्षण का प्रावधान है। पिछड़े जिलों में रहने वालों को 10% आरक्षण मिलता है।
बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल वकार, हसीना के रिश्ते में बहनोई
सेना प्रमुख जनरल वकार उज जमान सबसे अहम चेहरा बनकर सामने आए हैं। उन्होंने ही शेख हसीना के देश छोड़कर जाने और इस्तीफे का एलान किया। 20 दिसंबर, 1985 को बांग्लादेश की सेना में शामिल हुए जनरल वकार की छवि एक बेहद अनुशासित अधिकारी की रही है। वकार हसीना के सबसे पुराने करीबी सहयोगी व रिश्ते में बहनोई हैं। ऐसे में इस बात की बहुत कम संभावना है कि उन्होंने तख्तापलट किया है। जानकारों का मानना है कि हसीना का बांग्लादेश छोड़कर जाना और वकार का कमान संभालना एक सोचा-समझा निर्णय है। उनको रणनीतिक कौशल के लिए जाना जाता रहा है। बांग्लादेश से रक्षा अध्ययन में मास्टर डिग्री हासिल करने बाद किंग्स कॉलेज लंदन से रक्षा अध्ययन में एम की डिग्री लेने वाले वकार को इसी साल 23 जून को सेनाध्यक्ष बनाया गया।