म्यांमार में रविवार (8 नवंबर) को होने वाले आम चुनाव को लेकर 2015 जैसा आशाजनक माहौल नहीं है। पिछली बार आंग सान सू ची के नेतृत्व वाली नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) से उम्मीद थी कि वह लंबे समय से तानाशाही और नस्लीय हिंसा का शिकार रहे इस देश में शांति और समृद्धि के दौर की शुरुआत करेंगी। लेकिन पिछले पांच साल एनएलडी की साख खत्म होने का समय साबित हुआ है।
2015 में संसद के निचले सदन में जिन 330 सीटों पर प्रत्यक्ष मतदान हुआ, उनमें से एनएलडी ने 255 सीटें जीती थीं। (निचले सदन में 110 सीटें सेना के लिए आरक्षित हैं, जिनके लिए प्रत्यक्ष मतदान नहीं होता।) ऊपरी सदन में उसने 168 में 135 सीटों पर विजय प्राप्त की थी। तब एनएलडी ने 14 राज्यों की क्षेत्रीय विधानसभाओं में भी लगभग इतनी ही बड़ी जीत हासिल की थी। अपवाद सिर्फ रखाइन राज्य था, जहां अराकान नेशनल पार्टी को बहुमत मिला था।
इस बार चुनाव के पहले देश कई समस्याओं से जूझ रहा है। इनमें कोरोना महामारी, आर्थिक संकट, गृह युद्ध का अब तक समाप्त ना होना और नरसंहार के आरोपी लोगों पर मुकदमा चलाने के लिए बढ़ता अंतरराष्ट्रीय दबाव शामिल हैं। इस बार जातीयता आधारित (इथनिक) पार्टियां इन समस्याओं का फायदा उठाकर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश में हैं। ]
राजनीतिक विश्लेषकों में लगभग ये आम राय है कि एनएलडी के लिए इस बार पिछले प्रदर्शन को दोहराना आसान नहीं होगा। उसे सत्ता में होने का खामियाजा भुगतना पड़ेगा। इसके बावजूद मुमकिन है कि सरकार बनाने लायक बहुमत वो हासिल कर ले।
एनएलडी ने इस बारे में अपने चुनाव घोषणापत्र में जातीय विवाद को हल करने और असंतुष्ट गुटों से शांति समझौता करने का वादा किया है। साथ ही पार्टी ने संविधान में ऐसे सुधार करने का वादा किया है, जिससे म्यांमार एक वास्तविक संघीय लोकतंत्र बन सके। उसने इस महत्वपूर्ण सुधार का वादा भी किया है, जिससे सेना का काम नागरिकों और निर्वाचित सरकार की रक्षा करना हो जाएगा। यानी उसकी शासन तंत्र में भूमिका घट जाएगी।
लेकिन जानकारों का कहना है कि ये वादा निभाना आसान नहीं है, क्योंकि सेना ने शासन तंत्र पर अपनी मजबूत पकड़ बना रखी है। राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और प्रांतीय विधायिका में एक चौथाई सदस्य सेना द्वारा ही मनोनीत किए जाते हैं। एनएलडी संविधान संशोधन तभी कर पाएगी, जब विधायिका में उसका दो तिहाई बहुमत हो। इस बार इसे हासिल करना फिलहाल मुश्किल दिख रहा है।
चुनाव में एनएलडी का मुख्य मुकाबला यूनियन सॉलिडरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (यूएसडीपी) से है। इसे सेना समर्थित पार्टी समझा जाता है। जब सैनिक शासन था, तब इसका गठन सैनिक शासकों ने जन संपर्क बढ़ाने के लिए किया था। 2010 में इसे राजनीतिक पार्टी के रूप में तब्दील कर दिया गया। इसमें ज्यादातर पदाधिकारी सेना के रिटायर्ड अधिकारी हैं।
2015 के चुनाव में हार के बाद इस पार्टी में आम नागरिकों की भूमिका बढ़ाई गई, लेकिन अभी भी मोटे तौर पर इसकी छवि सेना की पार्टी की है। इसके अलावा 15 अन्य दल भी चुनाव मैदान में हैं। उनमें से कई दल क्षेत्रीय हैं, जो एक खास जातीय समूह में आधार रखते हैं। एक चुनाव पूर्व सर्वे से सामने आया कि यूएसडीपी के मुकाबले क्षेत्रीय दलों के जनाधार में पिछले पांच साल में ज्यादा इजाफा हुआ है।
जातीय समूहों ने 2015 में आंग सान सू ची से ऊंची उम्मीदें जोड़ी थीं। लेकिन उनकी पार्टी के सत्ता में आने के बाद उनका व्यवहार उनकी पुरानी छवि के मुताबिक नहीं रहा। इससे जातीयता आधारित दलों को निराशा हुई और इस बार वे पूरी ताकत लगाकर एनएलडी को चुनौती दे रहे हैं। लेकिन उनकी मुश्किल यह है कि देश के कई हिस्सों में उनके समर्थक जनाधार को गृह युद्ध जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए उनके समर्थक खुलकर मतदान कर पाएंगे इसमें संदेह है।
हाल ही में पश्चिमी रखाइन प्रांत को चुनाव आयोग ने गैर-मतदान वाला इलाका घोषित कर दिया। कचिन, शान और करेन राज्यों में भी अशांत पृष्ठभूमि के कारण कुछ इलाकों में मतदान नहीं होगा। कुल मिलाकर म्यांमार में प्रतिकूल परिस्थितियों में चुनाव होने जा रहा है।