विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) अगले माह दुनिया के सबसे आम कृत्रिम मीठे पदार्थ एस्पार्टेम (नॉन सैक्राइड स्वीटनर) को कैंसरकारक (कार्सिनोजेन) घोषित करने जा रहा है। यह फैसला खाद्य उद्योग और नियामकों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है, क्योंकि एस्पार्टेम का इस्तेमाल तमाम कोल्ड ड्रिंक, एनर्जी ड्रिंक, च्युइंग गम जैसी चीजों में हो रहा है।
डब्ल्यूएचओ की एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (आईएआरसी) इसे 14 जुलाई को आधिकारिक तौर पर कार्सिनोजेन घोषित करेगी। इससे पहले डब्ल्यूएचओ ने वजन नियंत्रण के लिए नॉन शुगर स्वीटनर (एनएसएस) का इस्तेमाल नहीं करने की सलाह दी थी, जिसके बाद से ही खाद्य उद्योग में हंगामा मचा है।
शोध को बढ़ावा देना मकसद
आईएआरसी ने कहा, एस्पार्टेम को संभावित कैंसरकारक घोषित करने का मकसद भ्रम या मुश्किलें पैदा करना नहीं है, बल्कि इसके संबंध में और ज्यादा शोध को प्रोत्साहित करना है।
40 वर्ष से बताते रहे सुरक्षित
जेईसीएफए 1981 से अब तक स्वीकृत दैनिक सीमा के भीतर एस्पार्टेम के सेवन को सुरक्षित बताती रही है। मिसाल के तौर पर 60 किलो वजन वाले एक वयस्क को एस्पार्टेम से जोखिम तभी होगा, जब वह हर दिन 12 से 36 कैन डाइट सोडा पी रहा हो।
शोध में कैंसर का दावा
एस्पार्टेम के इस्तेमाल पर पिछले वर्ष फ्रांस में एक लाख से ज्यादा लोगों पर शोध किया गया। इसमें सामने आया कि जो लोग जितना ज्यादा कृत्रिम मीठा लेते हैं, उनमें कैंसर का खतरा उतना ज्यादा बढ़ जाता है।
नियामक बोले- पैदा होगा भ्रम
जापान के स्वास्थ्य, श्रम और कल्याण मंत्रालय के अधिकारी नोजोमी टोमिता ने डब्ल्यूएचओ के उप निदेशक को लिखे एक पत्र में कहा, हम दोनों निकायों से जनता के बीच किसी भी भ्रम या चिंता से बचने के लिए एस्पार्टेम की समीक्षा के प्रयासों में समन्वय बनाने की मांग करते हैं। वहीं, अमेरिकी नियामक का कहना है कि दोनों प्रक्रियाओं को एक साथ आयोजित करने से भ्रम पैदा हो सकता है।
व्यापक असर की संभावना
आईएआरसी के फैसले का व्यापक असर हो सकता है, क्योंकि 2015 में ग्लाइफोसेट को कैंसरकारी घोषित किया गया था, जिसके बाद यूरोपीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण ने विरोध किया। 2021 में जर्मन कंपनी बायर को अमेरिकी अदालत के फैसले पर ग्लाइफोसेट-आधारित वीडकिलर्स के उपयोग करने वाले ग्राहकों को हर्जाना देना पड़ा था।
समीक्षा मायने नहीं रखती
अंतरराष्ट्रीय स्वीटनर एसोसिएशन के महासचिव फ्रांसिस हंटवुड का कहना है कि आईएआरसी की समीक्षा और फैसले मायने नहीं रखते। आईएसआरसी ने तो रातों-रात लाल मांस और मोबाइल फोन को भी संभावित कैंसरकारक घोषित कर दिया था।