पानीपत की सोनिया रोहिला मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए यूक्रेन गई थीं। शिक्षा की शुरूआती जरूरत के लिए उनके परिवार को 20 लाख रूपये जुटाने की जरूरत पड़ी थी। मध्यम वर्गीय रोहिला परिवार के लिए यह भारी रकम थी जिसे उन्होंने परिवार के कुछ लोगों से सहयोग लेकर और कुछ कर्ज पर लेकर पूरी की। लेकिन यूक्रेन-रूस युद्ध से अब सोनिया रोहिला की मेडिकल पढ़ाई का भविष्य पूरी तरह अंधेरे में नजर आ रहा है। उनका संस्थान भी अभी कुछ बता पाने की स्थिति में नहीं है कि बच्चों की शिक्षा का आगे क्या होगा और मेडिकल की पढ़ाई कैसे पूरी होगी।
पेरिस में रहने वाले सोनिया रोहिला के चचेरे भाई सुभाष रोहिला ने अमर उजाला को बताया कि पढाई के लिए एक साल की फीस एडवांस में देनी होती है। इसके साथ कुछ अन्य खर्चों को लेकर लगभग 15 लाख रूपये एडवांस में चुकाने पड़े थे। लेकिन अब रूस-यूक्रेन के बीच का यह युद्ध कब खत्म होगा, और उसके बाद पढ़ाई कब शुरू होगी, इसके बारे में अभी कुछ भी कहना मुश्किल है। इधर कर्ज पर लिया पैसा चुकाने का गंभीर संकट परिवार पर आ गया है।
लगभग 40 लाख रूपये तक का लिया कर्ज चुकाएंगे कैसे
मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए यूक्रेन की विभिन्न एजूकेशनल संस्थाएं 35 लाख रूपये से लेकर 50 लाख रूपये तक चार्ज करती हैं। औसतन एक छात्र को यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए 40 लाख रूपये तक की व्यवस्था करने की जरूरत पड़ती है। यह भारी रकम ज्यादातर छात्र अपनी पारिवारिक संपत्ति बेचकर, बैंकों से शिक्षा लोन लेकर या ब्जाज पर कर्ज लेकर चुकाते हैं। छात्रों और उनके परिवारों की उम्मीद होती है कि शिक्षा पूरी होने के बाद वे यूरोपीय देशों में अच्छी नौकरी पा सकेंगे और वे आसानी से यह कर्ज की रकम चुका सकेंगे।
लेकिन अचानक रूस-यूक्रेन के बीच युद्ध छिड़ जाने से बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ उनके परिवार के लोगों पर संकट गहरा गया है। परिवार समझ नहीं पा रहे हैं कि अब वे यह रकम कैसे चुकाएंगे। उनपर ब्याज का कर्ज लगातार बढ़ता जाएगा और बैंकों का दबाव बढ़ता रहेगा। यह संकट चंद छात्रों पर नहीं है, ऐसे छात्रों की संख्या 20 हजार से भी ज्यादा हो सकती है।
सुभाष रोहिला कहते हैं कि यह एक मध्यम वर्गीय परिवार के लिए 35-40 लाख रूपये की रकम बहुत बड़ी राशि होती है। इतनी बड़ी राशि के संकट में फंस जाने से पूरे परिवार पर संकट आ जाता है। सरकार को इन परिवारों को कर्ज चुकाने के लिए मदद करने का उपाय करना चाहिए। साथ ही बैंकों को भी स्थितियों का विचार कर कम से कम छात्रों से ब्याज नहीं लेना चाहिए।
अधिकारी कुछ भी कहने में असमर्थ
भारतीय छात्रों को यूक्रेन से बाहर निकालने में मदद कर रहे हरियाणा के अतुल सेठ ने अमर उजाला को बताया कि उनकी पहली प्राथमिकता छात्रों को सुरक्षित निकालना है। इसके बाद ही शिक्षा और अन्य समस्याओं के बारे में बातचीत की जा सकेगी। फिलहाल इस समय की स्थिति यह है कि शिक्षा के सारे संस्थान बंद कर दिए गए हैं। शिक्षक भी इस समय यह बता पाने में असमर्थ हैं कि इसके आगे क्या होगा और कब होगा।
भारी संख्या में यूक्रेनी छात्र और शिक्षक भी अपने देश को बचाने के लिए युद्ध में कूद पड़े हैं। यूक्रेन के शारीरिक रूप से कमजोर लोग देश से बाहर शरण ले रहे हैं तो सक्षम लोग रूसी सेना से युद्ध करने के लिए कमर कस रहे हैं। लोग ट्रेनिंग ले रहे हैं और जितना संभव हो सके, अपनी तरफ से अपने देश की सेवा में लग रहे हैं।
पहले जान बचाने का संकट
छात्रों के सामने पढ़ाई से पहले अपनी जान बचाने का संकट बना हुआ है। यूक्रेन में पढ़ाई करने गए छात्र विकास से जब अमर उजाला ने संपर्क किया तब उन्होंने कहा कि हमारे सामने सबसे पहले अपनी जान बचाने का संकट है। यहां (यूक्रेन बॉर्डर पर) स्थितियां लगातार गंभीर होती जा रही हैं। छात्रों को पूरी रात खुले में क़ड़ी ठंड में गुजारने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। विकास ने कहा कि उनके सामने पहले अपनी जान बचाने का संकट है। इसके बाद ही वे कुछ अन्य बात सोच पाएंगे।
विकास के साथ उनके दो दर्जन से ज्यादा साथी मंगलवार को भारतीय समय के अनुसार लगभग दो बजे रोमानिया बॉर्डर तक पहुंच चुके हैं। उन्हें यहां से बाहर निकालने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। भारत सरकार के मंत्रालय से कुछ मदद मिलने की उम्मीद है। भारतीय अधिकारी बच्चों को भोजन इत्यादि की सुविधाएं उपलब्ध कराने में जुटे हैं। उन्हें जल्द से जल्द विमान के जरिए भारत लाने की कोशिश की जा रही है।