रिपोर्ट कहती है कि बेजोफ के पास यह अथाह संपत्ति सिर्फ उनकी प्रतिभा का नतीजा नहीं है। इसके पीछे वैश्विक अर्थव्यवस्था को आकार देने वाली कई बड़ी ताकतों का भी हाथ है। इनमें से एक है डिजिटल प्रौद्योगिकी का असमान प्रभाव, जिसने लागत कम कर दी और लोगों को बेहतरीन सुविधाएं प्रदान की, लेकिन ऐसा सिर्फ उन्हीं के साथ हुआ जिनका प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ कुछ सुपरस्टार कंपनियों और उनके सबसे बड़े शेयरधारकों तक ही सीमित रह गया।
इसके अलावा इस अथाह संपत्ति के जमा होने के पीछे श्रम और आर्थिक नीति का भी असर है, जिसे बरकरार रखने में अमेरिका असफल रहा और जिसने तकनीक आधारित उद्योग से पैदा होनेवाली संपत्ति की समस्या को बढ़ावा दिया।
अमेजॉन का कहना है कि उसके गोदामों में काम करने वाले श्रमिकों को हर घंटे औसतन 15 डॉलर यानी करीब 1000 रुपये मिलते हैं, जिसमें वेतन और अन्य भत्ते भी शामिल हैं। हालांकि प्रति घंटे 15 डॉलर का वेतन बहुत होता है, लेकिन अमेरिका जैसे देश में एक परिवार को मूलभूत सुविधाएं पूरी करने के लिहाज से यह बहुत कम है। यह एक बहुत बड़ी समस्या है।
अब असली मुद्दे पर आते हैं कि आखिर जेफ बेजोस इस अकूत संपत्ति को कहां और कैसे खर्च करेंगे, जिससे इस समस्या को सुलझाया जा सके। 'विनर्स टेक ऑल' नामक पुस्तक के लेखक आनंद गिरिधर दास ने इस समस्या से उबरने के लिए कुछ लचीली आर्थिक नीतियों का सुझाव दिया है, जिसमें यूनियनों की मजबूती, न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी, शिक्षा के लिए समान भुगतान और ज्यादा प्रगतिशील टैक्स सिस्टम पर जोर दिया गया है।
इस समस्या पर दुनिया के दूसरे और तीसरे सबसे धनी बिल गेट्स और वारेन बफेट भी अपनी राय रख चुके हैं। उनका मानना है कि उन्हें और ज्यादा टैक्स देना चाहिए। अब जेफ बेजोफ इस समस्या से निपटने के लिए क्या करेंगे, ये तो वक्त ही बताएगा।