रिपोर्ट पर सीआरपीएफ चीफ राजीव राय भटनागर का कहना है कि लॉटरी सिस्टम में ड्रॉ किया जाता है। पर्चियों में बच्चों के नाम लिखे होते हैं। जिस भी बच्चे का नाम पर्ची में निकलता है उसे भर्ती कर लिया जाता है। इन बच्चों की उम्र 16-18 के बीच होती है। इनके परिवारों को कहा जाता है कि वह अपने एक बच्चे को नक्सलियों को तोहफे में दे दें। जिस कारण परिवार के दबाव में आकर बच्चों को नक्सलियों के साथ जाना पड़ता है।
उन्होंने बताया कि इन बच्चों में अधिकतर लड़के होते हैं जिनकी उम्र 16 साल से अधिक होती है। इन बच्चों का इस्तेमाल नक्सली पारंपरिक तौर पर करते हैं और इन्हें बाल दस्ता तथा बाल सैनिक कहा जाता है। इनका इस्तेमाल नक्सली मुठभेड़ के दौरान ढ़ाल के रूप में किया जाता है। ये बाल सैनिक तकनीकी और मुखबिरों का काम करते हैं। उन्होंने बताया कि इन बच्चों के माता पिता अपनी जान बचाने के लिए पुलिस को इस बारे में शिकायत नहीं करते हैं।
अधिकतर लोगों का इस रिपोर्ट पर कहना है कि यह एक तरह से अफवाह जैसा है क्योंकि ना तो इस रिपोर्ट में कोई केस स्टडी दी गई है और ना ही किसी प्रकार के कोई आंकड़ें बताए गए हैं। वहीं संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2017 में दुनिया भर के विभिन्न देशों में जो भी संघर्ष हुए हैं उनमें करीब 10,000 बच्चों की मौत हुई है और कुछ घायल भी हुए हैं। इसके अलावा 8,000 बच्चों को लड़ाकों के तौर पर इस्तेमाल किया गया है।