अमेरिका के मशहूर अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स ने भारत के जेएनयू विवाद को अपने संपादकीय पन्नों में जगह देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की कड़ी आलोचना की है।
अख़बार ने अपने ओपिनियन पेज पर लिखा है, ''भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत करने वाले लोगों और मोदी सरकार के बीच हिंसक विरोध की स्थिति बनी हुई है।
हिंदू दक्षिणपंथ से जुड़े उनके राजनीतिक सहयोगी असहमति के स्वर को शांत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।'' अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक इस टकराव से मोदी सरकार के प्रशासन को लेकर गंभीर चिंताजनक स्थिति बन रही है जिससे आगे संसद में आर्थिक सुधारों से जुड़ी प्रगति रुक सकती है।
राजकता का माहौल देखा गया
अख़बार ने लिखा है कि छात्र संगठन इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और मोदी सरकार द्वारा नियुक्त जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) का नया नेतृत्व, विश्वविद्यालय के परिसर में पुलिस को बुलाने और जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को देशद्रोह के मामले में गिरफ़्तार कराने में शामिल रहा है।
नई दिल्ली की एक अदालत में पिछले हफ़्ते कन्हैया के मामले में जहाँ सुनवाई होनी थी वहाँ अराजकता का माहौल देखा गया। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक भाजपा समर्थकों ने ''भारत माता की जय'' और "गद्दारों भारत छोड़ो" का नारा लगाया और पत्रकारों के साथ-साथ छात्रों पर भी हमला किया और पुलिस ने इसमें हस्तक्षेप नहीं किया।
एक अहम अधिकार है, न कि अपराध
कानून की परवाह किए बग़ैर भीड़ की ख़ुद की सज़ा देने की मानसिकता की पूरी जवाबदेही मोदी की सरकार की है। कन्हैया कुमार की गिरफ़्तारी के बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा, "अगर कोई भी भारत विरोधी नारे देता है और राष्ट्र की एकता और अखंडता पर सवाल उठाता है तो उन्हें बख़्शा नहीं जाएगा।"
नयूयॉर्क टाइम्स लिखता है, ''शायद राजनाथ सिंह यह स्पष्ट रूप से नहीं जानते हैं कि लोकतंत्र में असहमति ज़ाहिर करना एक अहम अधिकार है, न कि अपराध।'' अख़बार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा भारतीय नागरिक अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग करने के लिए सरकार की धमकियों के ख़िलाफ़ जो गुस्सा ज़ाहिर कर रहे हैं, वह सही है।
मोदी को ताकीद देते हुए अख़बार ने लिखा कि मोदी को अपने मंत्रियों और अपनी पार्टी पर लगाम लगाना चाहिए, मौजूदा संकट को शांत करने की कोशिश करनी चाहिए जिससे आर्थिक प्रगति में बाधा पहुंच सकती है और भारतीय लोकतंत्र को ख़तरा पैदा हो सकता है। फ़्रांस के प्रतिष्ठित समाचार पत्र ''ल मॉन्ड'' ने रविवार को फ़्रांसीसी सरकार से कहा कि वह भारतीय सरकार के सामने मानवाधिकारों से जुड़ी चिंताओं को उठाए।
'भारतीय लोकतंत्र के प्रमुख स्तंभों में से एक है'
अख़बार ने संपादकीय में लिखा, 'देशद्रोह के आरोपों में जेएनयू के एक छात्र और दिल्ली के एक पूर्व प्रोफ़ेसर की गिरफ़्तारी हिंदू राष्ट्रवादी सरकार की सत्तावादी धारा की नई मिसाल है।'
अख़बार ने कहा कि ऐसे व्यक्तियों या संगठनों को राष्ट्र के समर्थकों और रक्षक के तौर पर पेश करना अजीब है क्योंकि वे धर्मनिरपेक्षता को कमज़ोर करने की कोशिशों में जुटे हैं जो आज़ादी के बाद से ही भारतीय लोकतंत्र के प्रमुख स्तंभों में से एक है।
लंदन के अख़बार द गार्डियन ने भी कुछ दिन पहले अपने स्तंभ में इस मुद्दे पर चिंता जताई थी। द गार्डियन में एक स्तंभकार ने लिखा था, ''यह ऐसे लोगों के बीच का संघर्ष है जो भारत को लोकतांत्रिक, विविधतापूर्ण और सबको साथ लेकर चलने वाले समतावादी राष्ट्र के तौर पर देखते हैं जबकि दूसरा वर्ग राष्ट्रवादी आक्रामक धार्मिक दावे और बेलगाम पूंजीवादी विकास से जुड़ा है।''