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जानिए चीनी निवेश से क्यों डरा हुआ है अमेरिका

Tue, 22 May 2018 03:38 PM IST
बीबीसी, हिन्दी
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अमेरिका में बढ़ते चीनी निवेश ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इसकी वजह से अमेरिका विदेशी निवेश से जुड़े नियमों को सख्त करने पर विचार कर रहा है। लेकिन ऐसे बदलावों से विदेशी निवेश में कमी आने और नौकरियों पर असर पड़ने का खतरा भी मंडरा रहा है ग्रेटर सिनसिनाटी चाइनीज चैंबर ऑफ कॉमर्स के कार्यकारी निदेशक लिओ चान कहते हैं, "चीनी निवेश हो रहा है, यहां कंपनियां खरीदी जा रही हैं, फैक्ट्री और रेस्तरां खुल रहे हैं।

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जिससे इलाके में नौकरियां बढ़ाने में मदद मिली है"। अमेरिका के ओहियो शहर में रहने वाले चान विदेशी निवेश को लेकर आशान्वित हैं। उनका कहना है कि इससे पहले विदेशी प्रतियोगिता और वित्तीय संकट के कारण यहां का निर्माण क्षेत्र बुरे दौर से गुजर रहा था।

चीनी अर्थव्यवस्था से चुनौती

अमेरिकी सरकार चीनी निवेश पर नजर बनाए हुए हैं और विदेशी निवेश पर नियंत्रण के लिए नियमों को और सख्त करने पर काम कर रही है। हालांकि, इससे अमेरिका की दो प्राथमिकताएं, नौकरियां और राष्ट्रीय सुरक्षा आपस में टकरा भी सकती हैं। नियम कड़े किए जाने से कई कंपनियों और कानून निर्माताओं ने भी निवेशकों के पीछे हटने की चेतावनी दी है। लेकिन, नेताओं का मानना कुछ अलग है उनका कहना है कि बढ़ती तकनीक और चीन की अर्थव्यवस्था से उपजी चुनौतियों के कारण नियमों में बदलाव की जरूरत है।
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अमेरिका की चिंता का एक कारण ये भी है कि चीनी कंपनियां उच्च तकनीक उद्योगों को लक्षित कर रही हैं, वो जिस अमेरिकी तकनीक को खरीद रही हैं उसका सैन्य उद्देश्य के लिए इस्तेमाल हो सकता है। डेमोक्रेट पार्टी के नेता डेनी हैक कहते हैं, "हम चाहते हैं कि अमेरिका विदेशी निवेश के लिए एक बेहतरीन जगह बने लेकिन खुद को दूसरों के छुपे मंसूबों से बचाना भी महत्वपूर्ण है"।

बदलाव के बिना भी सख्ती

अमेरिका की परेशानी की झलक पहले से ही दिखने लगी है। नियमों में बदलाव किये बिना ही उसका रुख कड़ा हो गया है। अमेरिका में विदेशी निवेश के संबंध में बनी समिति जो राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिमों से जुड़े सौदों की समीक्षा भी करती है, उसने पिछले साल हुए 230 से ज्यादा लेन-देन की जांच की। ये साल 2011 के मुकाबले करीब दोगुना है और साल 2016 की तुलना में 40 फीसदी ज्यादा है।

इस साल समिति ने ऐंट फाइनेंशियल, जो अलीबाबा की डिजिटल पेमेंट शाखा है, उसके एक मनी ट्रांस्फर फर्म की बिक्री में रुकावट डाली है। पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स के सीनियर फेलो गैरी हफबर कहते हैं, 'अमेरिका जिस तरह से विदेशी निवेश का बाहें फैलाये स्वागत कर रहा था, अब उसमें पहले जैसा उत्साह नहीं है' हफबर कहते हैं कि यह मसला पहले भी उठता रहा है लेकिन औद्योगिक जासूसी के मामलों के बाद से चिंताएं और बढ़ गई हैं। अब स्थितियां और गंभीर हो चुकी हैं। 

वहीं, लिओ चान कहते हैं कि अमेरिका की यह चिंता कुछ वैसी ही है जैसी जापानी निवेश को लेकर हुई थीं लेकिन, इस बात का डर है कि चीन विरोधी माहौल के चलते निवेशक ओहियो जैसी जगहों से चले जाएंगे। वह कहते हैं, ''आप चीन के हर शख्स को दोषी ठहराते हैं और आपको इस पर अफसोस भी नहीं होता लेकिन इससे स्थानीय लोगों को बुरा लगता है''।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

चीनी निवेश को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है। जर्मनी से लेकर न्यूजीलैंड के कानून निर्माता तक इस संबंध में चेतावनी जारी कर चुके हैं क्योंकि चीन का विदेशी निवेश 12,261 करोड़ रूपये से ज्यादा पहुंच चुका है ये 10 साल पहले के मुकाबले दस गुना है यूरोपीय संघ भी नियम सख्त करने पर विचार कर रहा है। 

रोडियम ग्रुप और अमेरिकी चीनी संबंधों पर बनी राष्ट्रीय समिति की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016 में चीन का अमेरिका में 3,133 करोड़ रूपये निवेश का था और कपंनियों में करीब 1 लाख 40 हजार लोग नौकरियां कर रहे थे। रोडियम ग्रुप के अनुसार चीन का अधिकतर निवेश रियल स्टेट और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में है। कुछ चीनी कंपनियों ने अधिग्रहण और विलय के जरिये काम शुरू किया है जबकि कुछ कपंनियां अमेरिका में नई शुरुआत कर रही हैं। 

ओहियो में स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ डेटन में अर्थशास्त्री रिचर्ड स्टॉक कहते हैं कि वो राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर पैदा हुए खतरे के बारे में जानते हैं लेकिन जो यहां हो रहा है वो बिल्कुल अलग है। रिचर्ड कहते हैं कि जैसे फुयाओ ग्लास कंपनी ने यहां बंद हो चुके जनरल मोटर्स प्लांट में काम करने का फैसला लिया और इसके जरिए वो 2000 से ज्यादा लोगों को नौकरियां देगी। मुझे नहीं लगता कि इस सबसे राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई खतरा है।
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निवेश में जोखिम

अभी ये तय नहीं हुआ है कि अमेरिका अपने नियमों में कितनी सख्ती बरतने वाला है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मार्च में अमेरिका के ट्रेजरी डिपार्टमेंट से चीनी निवेश को नियंत्रित करने के तरीकों के बारे में पूछा था। सीनेट और हाउस इस पर काम कर रहे हैं जो इस साल कानून भी बन सकता है। इससे सरकार के पास विदेशी सौदों की जांच संबंधी अधिकार बढ़ जाएंगे।

वहीं, हफबर आगाह करते हैं कि इससे निवेश और उत्पादन पर असर पड़ सकता है। यह अमेरिकी कंपनियों के लिए शोध को और महंगा बना सकता है अगर आप एक देश के साथ दुश्मन की तरह व्यवहार करते हैं तो वह दुश्मन ही बन जाता है।

जबकि लिओ चान इन हालातों में भी हौसला बनाए रखने की बात करते हैं। उनका कहना है कि इस तरह के राजनीतिक दबाव बार-बार बनते हैं लेकिन ऐसे समय में आप सिर्फ शांत रह सकते हैं।
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