प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वाशिंगटन में होने वाली द्विपक्षीय बैठक पर दोनों देशों के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की भी निगाह टिकी हैं। इसकी वजह धरती की तस्वीर लेने वाले विश्व के सबसे महंगे सैटेलाइट का निर्माण है, जिसे भारत और अमेरिका द्वारा संयुक्त रूप से बनाया जा रहा है। इस सैटेलाइट का प्रयोग धरती पर जलवायु परिवर्तन के असर का अध्ययन करने के लिए किया जाएगा।
जलवायु परिवर्तन का मुद्दा वर्तमान अमेरिकी प्रशासन के लिए झुंझलाहट भरा रहा है। कूटनीतिक रूप से भारत और अमेरिका को वर्तमान में जो मुद्दा एक-दूसरे से अलग कर रहा है वह जलवायु परिवर्तन ही है।
भारत और अमेरिका का रुख इस पर अलग-अलग देखा गया है। ऐसे में दोनों नेताओं के बीच सभी संभावित मुद्दों में जलवायु परिवर्तन प्रमुख रहेगा। हाल ही में अमेरिका ने पेरिस जलवायु संधि से अलग होने का फैसला लिया है। वहीं भारत ने इसके प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की है।
यही कारण है कि लॉल एंजिल्स के उपनगरीय क्षेत्र पासाडेना के वैज्ञानिक चिंतित हैं, जो यहां जेट प्रोपल्शन लेब्रोटरी में नासा-इसरो के संयुक्त रूप से बनाए जा रहे सैटेलाइट एनआईएसएआर का निर्माण कार्य शुरू कर चुके हैं। अहमदाबाद के स्पेस ऐप्लिकेशंस सेंटर के वैज्ञानिक भी इसी कारण चिंता में हैं।
यदि कार्य उम्मीद मुताबिक चलता रहा तो एनआईएसएआर को 2021 में भारत से जीएसएलवी के जरिए लॉन्च किया जाएगा। इस परियोजन पर 1.5 बिलियन डॉलर खर्च किए जा रहे हैं। पासाडेना में सैटलाइट प्रॉजेक्ट के वैज्ञानिक पॉल ए रोजेन ने हाल ही में कहा था, ‘एनआईएसएआर इसरो और नासा के बीच पहला बड़ा सहयोग है, जिसमें रडारों का निर्माण किया जा रहा है।
यह दो फ्रीक्वेंसी के रेडार हैं। पहला 24 सेंटीमीटर का एल-बैंड रेडार और दूसरा 13 सेंटीमीटर का एस-बैंड रेडार। एस-बैंड को इसरो और एल-बैंड को नासा बना रहा है। यह सैटलाइट के प्रौद्योगिकी निर्माण में दोनों देशों के बीच अब तक का सबसे बड़ा सहयोगात्मक कार्य है।