जब से डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं, तभी से उन्होंने ईरान के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाया हुआ है। शुरू से वह जोर देते रहे कि ईरान पश्चिमी देशों के साथ नया परमाणु समझौता करे। जब ईरान इसके लिए राजी नहीं हुआ तो अमेरिका 2015 में हुए इस समझौते से मई 2018 में बाहर निकल गया।
इसके बाद आर्थिक प्रतिबंधों, धमकियों, परोक्ष युद्ध का जो सिलसिला शुरू हुआ था, उसने आज दोनों देशों के साथ-साथ पूरी दुनिया में तनाव पैदा कर दिया है। अमेरिका की डेलवेयर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर मुक्तदर खान बताते हैं कि दोनों देशों के बीच पिछले कुछ समय से एक तरह का युद्ध चल रहा है।
वह बताते हैं कि ये सिलसिला 1979 से शुरू हुआ है। ईरान मध्य पूर्व को स्थिर करने के लिहाज से अमेरिका के प्रमुख सहयोगियों में शामिल था। मगर 1979 में ईरान की इस्लामिक क्रांति के बाद अमेरिका से उसके रिश्ते बहुत खराब हो गए।
वैसे ईरान में अमेरिका विरोधी भावना तभी उपज गई थी जब ईरान में अगस्त 1953 में तख्तापलट हुआ था। मुक्तदर खान बताते हैं कि उस दौरान अमेरिका ने चार दिनों के अंदर प्रदर्शन करवाकर चुने हुए प्रधानमंत्री मोहम्मद मुसाद्दिक को हटाकर बादशाहियत लागू करवा दी थी यानी लोकतंत्र की जगह राजशाही स्थापित कर दी थी।
लेकिन इसके बाद जब इस्लामिक क्रांति हुई और मोहम्मद रजा पहलवी को सत्ता से हटाया गया, उसके बाद से लगातार अमेरिका पर ईरान में सत्ता परिवर्तन की कोशिशों को आरोप लगता रहा है।
प्रोफेसर मुक्तदर खान बताते हैं कि इसके अलावा ईरान-इराक जंग में अमेरिका ने इराक का साथ दिया, उससे भी रिश्ते खराब हुए। वह कहते हैं कि अमेरिका लगातार ईरान की राजनीति और सत्ता को बदलने की कोशिश कर रहा है जबकि ईरान की कोशिश है कि न सिर्फ मध्य पूर्व में अमेरिका के प्रभुत्व को खत्म करके बल्कि फलस्तीनी इलाकों से इस्राइल का नियंत्रण भी खत्म करे।
प्रोफेसर मुक्तदर खान बताते हैं कि वहीं से चलता आ रहा यह सिलसिला अब सुलेमानी की मौत तक पहुंच गया है। वह बताते हैं कि अमेरिकी अधिकारियों का अनुमान है कि जनरल सुलेमानी ने इराक में 1100 से 1700 के बीच अमेरिकियों को मरवाया है। यानी अमेरिका और ईरान के बीच शीत युद्ध नहीं बल्कि एक गुनगुना युद्ध चल रहा है।
जनरल कासिम सुलेमानी ईरान के लिए कितने अहम थे, इसका पता इस बात से लगाया जा सकता है कि जहां-जहां से उनका जनाजा गुजरा, लाखों की संख्या में लोग जुटे। मंगलवार को तो उनके पैतृक शहर किरमान में इतने लोग जुटे की भगदड़ में पचास से अधिक लोगों की जान चली गई। अहवाज और तेहरान में भी मानो लोगों का समंदर उमड़ आया हो। तेहरान में रहने वालीं वरिष्ठ पत्रकार जहारा ज़ैदी बताती हैं कि सुलेमानी इतने लोकप्रिय थे कि उनके जनाजे में शामिल भीड़ ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।
वह कहती हैं कि पूरे देश में उनके लिए अलग तरह की मोहब्बत भी थी और बाहर के देशों में भी लोग उन्हें चाहते थे। इसका कारण क्या था, ये बात या तो वो खुद जानते थे या उनका खुदा जानता है। तेहरान में इतनी भीड़ थी कि सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। यहां तक कहा जा रहा है कि अयातुल्लाह रुहोल्ला खामनेई के जनाजे में जितने लोग रहे होंगे, अगर उससे ज्यादा लोग सुलेमानी के जनाजे में नहीं थे तो कम भी नहीं रहे होंगे।
कासिम सुलेमानी ईरान के इस्लामिक रेवल्यूशनरी गार्ड्स की जिस कुद्स फोर्स का नेतृत्व करते थे, वह ईरान के मिलिटरी इंटेलिंजेंस से जुड़े काम को संभालती है। मध्य पूर्व में बढ़ते ईरान के प्रभाव का श्रेय जनरल सुलेमानी और कुद्स फोर्स को ही दिया जाता है। सुलेमानी की मौत से ईरान में गम और गुस्से का माहौल तो बेशक है, मगर क्या इसे ईरान के लिए बहुत बड़ा झटका कहा जा सकता है?
ईरान ने बेशक एक लोकप्रिय शख्सियत को खोया है, मगर उनके मारे जाने से ईरान को क्या नुकसान हुआ और अमेरिका ने क्या हासिल किया? इस बारे में प्रोफेसर मुक्तदर खान कहते हैं कि सुलेमानी को लेकर अमेरिका की रणनीति कुछ अजीब सी लगती है।
वह कहते हैं कि अल कायदा के ओसामा बिन लादेन और इस्लामिक स्टेट के अबु बकर अल-बगदादी को मारने की कूटनीतिक अहमियत थी जिससे इनके संगठन ही कमजोर हो गए। मगर सुलेमानी की मौत से वैसा फायदा नहीं होगा क्योंकि यह एक तरह से वैसी बात है कि वह किसी बीमारी से गुजर गए हों या समय से पहले रिटायर हो गए हों। उनकी जगह नए जनरल ने ले ली है और हो सकता है वह ईरान के लिए सुलेमानी से बेहतर साबित हो जाएं।
मुक्तदर खान कहते हैं कि सुलेमानी की मौत से ईरान के रेवल्यूशनरी गार्ड्स को धक्का नहीं लगा, उनकी क्षमता में भी फर्क नहीं आया। सुलेमानी कोई राजनेता भी नहीं थे कि उनके न रहने से देश की दिशा नहीं रहेगी। इससे अमेरिका को रणनीतिक रूप से कोई फायदा नहीं होगा। उल्टा ईरान को गुस्से और प्रेरणा का जरिया दे दिया गया। साथ ही प्रतिबंधों के कारण आर्थिक गड़बड़ियों से ईरान की जनता नाराज थी मगर अब वह अपनी सरकार के साथ खड़ी हो गई है। इस नजरिए से यह समझदारी भरा फैसला नहीं कहा जा सकता।
जब सुलेमानी पर हमले से ईरान के हथियारों, उसकी क्षमता को नुक़सान नहीं पहुंचा तो फिर अमेरिका ने ये कदम क्यों उठाया? यरूशलम में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार हरेंद्र मिश्रा बताते हैं कि अमेरिका ने इस कार्रवाई से अपने अहम सहयोगी देश इस्राइल का भरोसा जीता है।
वह कहते हैं कि इस्राइल मानता है कि उसके खिलाफ जितने भी हमले हुए, जो भी साजिशें हुईं, उनके लिए सुलेमानी जिम्मेदार थे। इस्राइली सरकार ने सुलेमानी पर हुए हमले का समर्थन किया है। दरअसल इस्राइल में पहले ऐसी सोच बन रही थी कि शायद अब अमेरिका हमारी सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार नहीं होगा। मगर इस कार्रवाई के बाद लोगों को लग रहा है कि ईरान के खिलाफ लड़ाई में इस्राइल अब अकेला नहीं है, अमेरिका उसके साथ है।
दरअसल इस्राइल और फलस्तीन के बीच कभी सीधा संघर्ष नहीं हुआ है मगर ईरान पर हिज्बुल्ला और हमास जैसे उन गुटों का लंबे समय से समर्थन करने के आरोप लगते रहे हैं जो इस्राइल को निशाना बनाते हैं।
अमेरिका ने कुद्स फोर्स और सुलेमानी को आतंकवादी घोषित किया हुआ था। अमेरिका का मानना है कि मध्य पूर्व, खासकर इराक में कई अमेरिकियों की मौत के लिए सीधे तौर पर सुलेमानी और कुद्स फोर्स जिम्मेदार है।
जैसे ही कासिम सुलेमानी की मौत की खबर आई, अमेरिका के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि ये कदम राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश के बाद उठाया गया। सुलेमानी को मारने का फैसला करने के पीछे अमेरिका में कुछ आंतरिक कारणों पर भी चर्चा हो रही है, जिनमें जल्द होने जा रहे राष्ट्रपति चुनाव और डोनाल्ड ट्रंप पर चल रहा महाभियोग भी शामिल है।
प्रोफेसर मुक्तदर खान बताते हैं कि घरेलू मुद्दों को लेकर बात चल रही है कि ट्रंप ने 2015 में 15-20 बार ट्वीट किया था कि ओबामा ईरान से जंग शुरू कर देंगे चुनाव जीतने के लिए। अब कहा जा रहा है कि ट्रंप वही तर्क इस्तेमाल कर रहे हैं। एक तो चुनाव जीतने के लिए और दूसरा इसलिए कि युद्ध होता है तो उस दौरान राष्ट्रपति को शायद न हटाया जाए।
चर्चा है कि महाभियोग को अजेंडे से हटाने और चुनावों में पुरातनपंथियों का समर्थन हासिल करने के लिए वह ऐसा कर रहे हैं। हालांकि विश्लेषकों का यह भी कहना है कि पिछले तीन-चार महीनों में ईरान की ओर से भी उकसावे वाली कार्रवाइयां हुई हैं। जैसे कि सऊदी रिफाइनरी पर हमला और फिर इराक में पिछले हफ्ते सात अमेरिकियों को मारना। सीधे अमेरिका से जुड़े लोगों और संपत्तियों पर हमले के जवाब में अमेरिका को जब मौका मिला तो उसने सुलेमानी को रास्ते से हटा दिया।
बुधवार को ईरान ने इराक में मौजूद अमेरिका सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया तो उसके विदेश मंत्री जवाद जरीफ ने कहा कि उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के प्रावधानों के अनुसार आत्मरक्षा के अधिकार के तहत यह कदम उठाया है।
इराक के अलावा मध्य पूर्व में अमेरिका के अन्य सहयोगी देश, जैसे कि सऊदी अरब और इस्राइल पहले ही सावधान हैं। वरिष्ठ पत्रकार हरेंद्र मिश्रा बताते हैं कि इस्राइल में इस बात की भी आशंका जताई जा रही है कि ईरान उनके यहां हमला कर सकता है।
वह बताते हैं कि यहां इस्राइल में एक दबी हुई खुशी नजर आ रही है मगर साथ ही डर भी है क्योंकि ईरान ने खुलकर कहा है कि अमेरिका टारगेट्स के साथ इस्राइल पर भी हमला कर सकता है और इसमें सक्षम भी है क्योंकि इस्राइल ईरान के रॉकेट्स के दायरे में आता है। ऐसे में तैयारी चल रही है कि अगर स्थिति हाथ से निकलती है तो समय पर कदम उठाए जा सकें।
वरिष्ठ पत्रकार हरेंद्र मिश्रा बताते हैं कि मध्य पूर्व की बात जहां तक है, ईरान की यहां काफी अच्छी पकड़ बन चुकी है। सीरिया में बशर अल असद अगर अब तक कुर्सी पर मौजूद हैं तो रूस और ईरान के कारण। ईरान सुलेमानी के नेतृत्व में सीरिया की मदद करता रहा है। लेबनान में भी उनकी अच्छी पकड़ है। गजा पट्टी में हमास को भी ईरान का राजनीतिक और आर्थिक समर्थन मिलता रहा है। वह भी दबाव पड़ने पर इस्राइल के ख़िलाफ जंग छेड़ सकता है।
हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि ईरान चाहे तो जरूर युद्ध का माहौल बिगड़ सकता है और ऐसे संकेत भी मिल रहे हैं। यह भी माना जा रहा है कि ईरान गोपनीय ऑपरेशन भी चलाना चाहेगा क्योंकि उसके हालात ऐसे हैं कि वह आर्थिक स्थिरता न होने के कारण बड़ा कदम उठाने से बचेगा।
ईरान के नेतृत्व के ऊपर सुलेमानी की मौत का बदला लेने का भारी दबाव है। लेकिन पहले से ही आर्थिक प्रतिबंधों की मार झेल रहा ईरान इस स्थिति में नहीं है कि वह अमेरिका और उसके सहयोगियों से युद्ध में उलझे।
वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नाराजगी भी मोल नहीं लेना चाहेगा। फिर, उसके पास विकल्प क्या हैं? अमेरिका की डेलवेयर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मुक्तदर खान बताते हैं कि ईरान अमेरिका के सहयोगी देशों के नागरिक ठिकानों को निशाना नहीं बना सकता। अगर वह ऐसा करता है तो अमेरिका का दावा मजबूत होगा कि ईरान के रेवल्यूशनरी गार्ड्स और अल कुद्स फोर्स आतंकवादी संगठन हैं। इसलिए ईरान सैन्य ठिकानों पर ही हमला करेगा।
ईरान ने ऐसा किया भी। बुधवार को उसने इराक में मौजूद दो सैन्य ठिकानों पर कई बैलिस्टिक मिसाइल दागे। क्या होगा ईरान अगर अमेरिका के साथ सीधी लड़ाई करने उतर जाए? प्रोफेसर मुक्तदर खान कहते हैं कि इसमें ईरान की हार होने की संभावनाएं अधिक नजर आती हैं।
वह बताते हैं कि ईरान को बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है। उसने कुछ साल पहले अमेरिका के एक जहाज पर हमला किया था तो बदले में अमेरिका ने उसकी एक तिहाई नेवल ऐसेट्स तबाह कह दिए थे। ऐसे में ईरान अप्रत्यक्ष हमला कर सकता है। जैसे अल शबाब ने केन्या में हमला किया है जिसमें अमेरिकियों की मौत हुई है। यह सेकंड टियर अटैक है।
मुक्तदर खान के अनुसार ईरान तीन तरीकों से अमेरिका को निशाना सकता है- पहला तरीका है मध्य पूर्व में मौजूद अमेरिका सैनिकों पर हमला करके, दूसरा तरीका है- अन्य देशों में मौजूद अमेरिका दूतावासों या वहां काम करने वाले अमेरिका कॉन्ट्रैक्टर्स वगैरह को निशाना बनाकर और तीसरा है- अमेरिका के सहयोगी देशों के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर।
ईरान का शीर्ष नेतृत्व बार-बार कह रहा है कि सुलेमानी की मौत का बदला लिया जाएगा। और बदला तभी लिया जा सकता है जब बदले की कार्रवाई करके जिम्मेदारी ली जा सके। इसलिए माना जा रहा है कि ईरान अमेरिका के सहयोगियों जैसे कि सऊदी अरब के ऐसेट्स को निशाना बना सकता है और कुछ सबूत छोड़ सकता है।
मुक्तदर खान कहते हैं कि जब पिछले दिनों सऊदी अरब की रिफाइनरियों पर हमला हुआ था ईरान ने इतने सबूत छोड़े थे कि अमेरिका को पता चल सके कि हमला किसने किया है। तो यह आने वाले चंद महीनों में काफी मुश्किल रहने वाला है। जैसे-जैसे अमेरिका में चुनाव के दिन करीब आएंगे, ईरान कोशिश करेगा कि अमेरिका के ठिकानों पर हमले करके ट्रंप को मुश्किल में डाला जाए।
सऊदी अरब में अरामको की रिफाइनरियों पर हुए हमले की जिम्मेदारी हूती विद्रोहियों ने ली थी मगर सऊदी अरब ने ड्रोन के हिस्से दिखाकर ईरान पर आरोप लगाया था।
ईरान ने पिछले कुछ सालों में अपना प्रभाव बढ़ाया है। लेबनान, इराक, सीरिया, यमन तक में विद्रोही समूहों और मिलिशिया को वह समर्थन देता रहा है। इसके अलावा सीरिया में इस्लामिक स्टेट समूह के खिलाफ सक्रिय रहकर भी उसने तुर्की और रूस जैसे देशों से करीबी बढ़ाई है। चीन भी समय-समय पर ईरान का साथ देता रहा है। अगर युद्ध की स्थिति बनी तो क्या ये देश ईरान का साथ दे पाएंगे?
इस सवाल पर मध्य पूर्व मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार हरेंद्र मिश्रा कहते हैं कि ये देश समय-समय पर अमेरिका के विरोध में मुखर रहे हैं। अगर वे अमेरिका विरोधी स्टैंड लेकर एक समूह में आते हैं तो भयावह स्थिति पैदा हो सकता है। हालांकि माना जा रहा है कि ईरान खुद कोई बड़ा क़दम उठाने से संकोच करेगा। इसलिए बहुत से समीक्षकों का मानना है कि ईरान पहले की ही तरह गोपनीय ऑपरेशन चलाता रहेगा।
मध्य पूर्व में कौन ईरान के साथ आएगा, इसे लेकर भी कोई बात निश्चित रूप से नहीं कही जा सकती क्योंकि यहां गुटबाजी बहुत है। इनमें कई समूह कई मौकों पर एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते हैं तो कई बार एक-दूसरे का साथ भी देते हैं।
सीरिया इसका उदाहरण है जहां पर अमेरिका भी इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लड़ रहा था तो ईरान भी। हरेंद्र मिश्रा मानते हैं कि शायद इसी कारण सुलेमानी बगदाद में बेफिक्र थे। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि बगदाद में उन्हें इस तरह से निशाना बनाया जाएगा।
मगर प्रोफेसर मुक्तदर खान का मानना है कि अमेरिका स्थिति मध्य पूर्व में समय के साथ खराब हुई है। ईरान के नेता लंबे समय से अमेरिका को तबाह कर देने की बातें करते रहे हैं और अमेरिका भी ईरान को सबक सिखाने के इरादे जताता रहा है।
जबकि एक समय था जब ईरान, मध्य पूर्व में अमेरिका का सबसे करीबी सहयोगी था। लेकिन वक्त के साथ दोनों के रिश्ते इतने खराब हो गए कि बात अब खुले युद्ध की होने लगी है और खुलकर हमले भी होने लगे हैं।
मुक्तदर खान बताते हैं कि हालात ऐसे हो गए हैं कि मध्य पूर्व में अमेरिका को लेकर जो डर और इज्जत था, वह खत्म हो गए हैं। वह कहते हैं कि जब भी मैं मध्य पूर्व की सरकार या डिफेंस के लोगों से बात करता हूं यह सुनने में आता है कि अमेरिका बेवकूफ हैं।
मगर इस्राइलियों को लेकर उनके मुंह से मैंने ऐसी बात नहीं। वे इस्राइल से डरते हैं और उसकी इज्जत करते हैं। मगर अमेरिका को लेकर डर भी खत्म है और इज्जत भी। अब कोई भी सोचता है कि वह अमेरिका से पंगा से सकता है और उसके लिए परेशानी खड़ी कर सकता है।
ईरान समेत पूरा मध्य पूर्व दुनिया भर के तेल उत्पादन का अहम केंद्र हैं। यहां होने वाली छोटी से छोटी हलचल भी कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव ला देती है। सुलेमानी की मौत और फिर ईरान की जवाबी कार्रवाई का असर भी तेल की कीमतों पर पड़ा। आशंका ये है कि मामला ने तूल पकड़ा तो इसका असर तेल की आपूर्ति पर न पड़ जाए। इसकी आशंका भर से पूरी दुनिया के शेयर बाजार तक हिल गए।
पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्ता में तेल का अहम योगदान है। ईरान पर भले ही अमेरिका प्रतिबंध लगे हैं मगर कुवैत, इराक, यूएई और सऊदी अरब जैसे देश हॉमरूज जलडमरूमध्य के जरिए तेल की आपूर्ति करते हैं।
अगर इस क्षेत्र में तनाव बढ़ा तो यह जलमार्ग बंद हो सकता है या फिर ईरान इसे बंद कर सकता है। इस स्थिति में तेल के जहाजों का रास्ता रुक जाएगा और नुकसान भारत समेत कई देशों को होगा। इसलिए फिलहाल यही उम्मीद की जा रही है कि मध्य पूर्व में पैदा हुए हालात और खराब न हों और अमेरिका व ईरान के बीच तनाव घटाने का कोई रास्ता निकल आए।