इस तूफान की वजह से करीब ढाई लाख लोगों को विस्थापित होना पड़ा और प्राण घातक भूस्खलन की घटनाएं हुई। जर्मनी को गत वर्ष सबसे अधिक गर्मी की तपिश और सूखे का सामना करना पड़ा और औसत तापमान के करीब तीन डिग्री सेल्सियस से अधिक होने के कारण चार महीनों में 1,250 लोगों की असामयिक मौत हुई और पांच अरब डॉलर का नुकसान हुआ। भारत ने भी 2018 में लू की मार और 100 साल की सबसे भीषण बाढ़ और दो तूफान का सामना किया। इससे कुल 38 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है।
जलवायु परिवर्तन से फ्रांस में हजारों की मौत
साल 2018 में मौसम के कारण आई आपदा से साबित हुआ कि सबसे विकसित अर्थव्यवस्था भी प्रकृति की दया पर निर्भर है। जर्मनवॉच की शोधकर्ता लौरा स्किफर ने कहा, ‘विज्ञान ने साबित किया है कि जलवायु परिवर्तन और बार-बार बहने वाली गर्म हवाओं में गहरा संबंध है।’ उन्होंने कहा, ‘यूरोप में सौ साल पहले के मुकाबले गर्म हवाओं के चलने की आशंका 100 गुना तक बढ़ गई है।’ साल 2003 में तपिश की वजह से पश्चिमी यूरोप में खासतौर पर फ्रांस में करीब 70,000 लोगों की मौत हुई थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि गत 20 साल में सबसे गरीब क्षेत्रों पर मौसम की सबसे अधिक मार पड़ी है।