अफीम की खेती पर रोक लगाने के तालिबान सरकार के फैसले से फिलहाल अफगानिस्तान के अफीम उत्पादकों और विक्रेताओं की चांदी हो गई है। हालांकि उनमें यह डर भी समा गया है कि अगर तालिबान ने सचमुच यह कारोबार रोकने की गंभीरता दिखाई, तो उनकी आमदनी का जरिया खत्म हो जाएगा। मीडिया रिपोर्टों के मुताबित अफीम की खेती पर रोक लगाने के सरकारी एलान के बावजूद कंदहार और हेल्मांद प्रांतों में अफीम के खेतों में चहल-पहल दिख रही है। उधर विक्रेता तीन गुने दाम पर अफीम बेच रहे हैं।
लेकिन फिलहाल सूरत अलग है। अफीम कारोबारी अब्दुल कदूस ने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से कहा- ‘ये अफीम का सीजन है। प्रतिबंध का एलान होने के बाद से हमारा कारोबार तेजी से बढ़ा है।’ कदूस ने बताया कि फिलहाल वे साढ़े 22 हजार डॉलर प्रति दिन का कारोबार कर रहे हैं। अफगानिस्तान में प्रति व्यक्ति सालाना औसत आमदनी 500 डॉलर से भी कम है।
अफीम किसान बिस्मिल्लाह जान ने कहा- ‘अभी अफीम की कटाई जारी रखने की इजाजत दी गई है। लेकिन बताया गया है कि अगले साल से अफीम की खेती पर रोक लगा दी जाएगी।’ तीन अप्रैल को तालिबान के सर्वोच्च नेता हबीतुल्लाह अखुंदजादा ने कहा था कि अफीम और अन्य मादक पदार्थों की खेती, उसके उत्पादन, इस्तेमाल और परिवहन पर पूरी रोक लगाई जा रही है।
विश्लेषकों का कहना है कि अगर तालिबान सचमुच अफीम की खेती रोकने में सफल रहा, तो यह अफगानिस्तान में एक बड़ा बदलाव होगा। पिछली बार तालिबान जब सत्ता में था, तब उसने अपने कब्जे वाले इलाकों में अफीम का कारोबार रोक दिया था। इस बात को संयुक्त राष्ट्र की मई 2001 में जारी एक रिपोर्ट में भी स्वीकार किया गया था। लेकिन पिछले दो दशकों के दौरान देश में गृह युद्ध के माहौल में नशीली पदार्थों का कारोबार तेजी से बढ़ा।
तकूर ने कहा- ‘पिछले अमीरात (इस्लामी शासन) में सुप्रीम लीडर ने अफीम पर रोक लगाने का आदेश जारी किया था। उस पर पूरा अमल हुआ। इस बार हमें उम्मीद है कि अफीम की खेती को खत्म करने में हमें लोगों का पूरा साथ मिलेगा।’