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अफगानिस्तान: फौज वापसी से अमेरिका को हासिल क्या हुआ? जिनके खिलाफ छेड़ी जंग, उन्हीं से किया करार

Thu, 01 Jul 2021 04:38 PM IST
सुरेंद्र जोशी वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल

सार

पड़ोसी देश अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी 11 सितंबर तक हो जाएगी। इससे इलाके में नए समीकरण पैदा हो सकते हैं और आतंक के खिलाफ वैश्विक जंग भी कमजोर पड़ सकती है। 
 
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अमेरिका-अफगानिस्तान - फोटो : iStock
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विस्तार
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अफगानिस्तान से ज्यादातर अमेरिकी सैनिकों की वापसी अगले कुछ दिनों में पूरी हो जाएगी। उसके बाद मुमकिन है कि यहां सिर्फ तकरीबन 1000 अमेरिका फौजी रह जाएं, जिन्हें काबुल स्थित अमेरिकी दूतावास और काबुल हवाई अड्डे की सुरक्षा में तैनात किया जाएगा। इन सैनिकों की वापसी भी अगले 11 सितंबर तक हो जाएगी। 

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अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन ने कई सैनिक सूत्रों के हवाले से ये खबर दी है। सीएनएन ने कहा है कि औपचारिक रूप से अफगानिस्तान में अमेरिका का 20 साल पुराना 'आतंक के खिलाफ युद्ध' 11 सितंबर को खत्म होगा, लेकिन व्यावहारिक रूप में इस पर विराम लग चुका है।

2001 में अमेरिका ने छेड़ा था युद्ध
साल 2001 में 11 सितंबर को अमेरिका में हुए आतंकवादी हमलों के बाद अमेरिका ने 'आतंक के खिलाफ युद्ध' की शुरुआत की थी। तभी उसकी फौज अफगानिस्तान में तैनात की गई थी। अब अमेरिका में इस युद्ध की सफलता और नाकामियों पर चर्चा तेज हो गई है। सीएनएन के एक विश्लेषण में कहा गया है कि 'आतंक के खिलाफ युद्ध' शुरू करते समय अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने जोर दिया था कि इसके जरिए वे अंतरराष्ट्रीय संबंधों के नए सिद्धांत तय करेंगे, जिससे आने वाले दशकों में दुनिया चलेगी। लेकिन लंबे समय तक अफगानिस्तान में अमेरिका के उलझे रहने से उलटे अमेरिकी वर्चस्व को लेकर नए सवाल उठ गए। साथ ही अमेरिका के अंदर ये मुद्दा गहरे विवाद का विषय बन गया।
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मकसद की कामयाबी को लेकर सवाल,  3500 सैनिक शहीद हुए
अब अमेरिका में यह सवाल उठाया जा रहा है कि अमेरिका जिस मकसद से अफगानिस्तान गया था, क्या उसे वह हासिल कर पाया। गौरतलब है कि इस युद्ध में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के 3,500 से ज्यादा सैनिक मारे गए। उससे कहीं ज्यादा फौजी विकलांग हुए। इस दौरान अफगानिस्तान के हजारों सैनिक और नागरिक भी मारे गए। कुल कितनी मौतें हुईं, इसकी कोई गिनती मौजूद नहीं है। अब जबकि अमेरिका का 'सबसे लंबा युद्ध' खत्म होने जा रहा है, तो अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से अमेरिका के अंदर कई हलकों से ये सवाल पूछा जा रहा है कि क्या अब अफगानिस्तान की जनता के प्रति अमेरिका की कोई जिम्मेदारी नहीं है? 

फिर बढ़ रही है हिंसा, तालिबान के कब्जे की आशंका
गौरतलब है कि अफगानिस्तान में हिंसा बढ़ रही है। वहां सत्ता का कोई ठोस ढांचा नहीं उभरा है। ऐसे में उसका भविष्य अंधकारमय माना जा रहा है। गृह युद्ध में तालिबान को मिल रही बढ़त से चिंताएं और बढ़ गई हैं। तालिबान ने देश के कई जिलों और शहरों पर अपना कब्जा जमा लिया है। आशंका यह है कि अमेरिकी फौज की वापसी पूरी होते ही काबुल पर भी तालिबान का कब्जा हो सकता है।

जिसे उखाड़ने का संकल्प लिया, उसी से समझौता किया
विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका ने तालिबान की सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए ही अफगानिस्तान पर हमला किया था। पिछले साल पूर्व डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को उसी तालिबान से आमने-सामने बैठ कर समझौता करना पड़ा। अब एक बार फिर उसी तालिबान का अफगानिस्तान पर कब्जा हो जाने की आशंका गहरी हो गई है। विश्लेषकों ने सवाल उठाया है कि क्या इस सूरत में अमेरिका ये दावा कर सकता है कि हजारों जान गंवाने और खरबों डॉलर के खर्च के बाद भी उसने अपना 'अफगान मिशन' पूरा कर लिया है?

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