विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार
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अफगानिस्तान में शांति बहाली के लिए अमेरिका और तालिबान में हुए समझौते को लेकर भारत ने खुशी जाहिर की है। विदेश मंत्रालय ने शनिवार को कहा कि हमें लगता है कि अफगानिस्तान के पूरे राजनीतिक वर्ग ने इस मौके का स्वागत किया है। उम्मीद है कि इस समझौते से देश में शांति और स्थायित्व आएगा।
विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि भारत हमेशा से ही अफगानिस्तान में शांति, सुरक्षा और स्थायित्व लाने के समर्थन में रहा है। पड़ोसी होने के नाते हम आगे भी सरकार और अफगानिस्तान के लोगों का समर्थन करते रहेंगे।
अफगानिस्तान में शांति बहाली के प्रयासों में अफगान सरकार और तालिबान के प्रतिनिधि 10 मार्च को नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में बैठक होगी। 9/11 के हमले के बाद शायद यह पहला ऐसा मौका होगा जब इन दोनों के बीच आमने-सामने की बैठक होगी।
तालिबान के साथ हुए समझौते के मुताबिक अमेरिका अफगानिस्तान में अपने सैनिकों की संख्या घटाकर 8,600 करने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन अधिकारियों ने कहा कि अगर अफगान पक्ष किसी समझौते पर पहुंचने में नाकाम रहता है तो अमेरिका अपने सैनिकों की वापसी के लिए बाध्य नहीं है।
अफगानिस्तान में अभी करीब 14,000 अमेरिकी सैनिक हैं। नाम ना जाहिर करने की शर्त पर अधिकारी ने कहा, 'हमारी वापसी इस समझौते से जुड़ी है और शर्तों पर आधारित है। अगर राजनीतिक समझौता विफल होता है, अगर वार्ता नाकाम होती है तो ऐसी कोई बात नहीं है कि अमेरिका सैनिकों की वापसी के लिये बाध्य है।'
कांग्रेस ने अमेरिका और तालिबान के बीच शांति समझौते की पृष्ठभूमि में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपेक्षा है कि अमेरिका-तालिबान शांति समझौते का भारत की सुरक्षा पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
पार्टी के वरिष्ठ प्रवक्ता आनंद शर्मा ने कहा कि भारत को अपने हित, अपनी सुरक्षा को अनदेखा नहीं करना चाहिए। ये पार्टी की सलाह है क्योंकि तालिबान को दिया जा रहा समर्थन मौलाना मसूद अजहर को ही मिलेगा। उन्होंने कहा, 'इसके मद्देनजर देखें कि किसी भी तरह का प्रतिकूल प्रभाव भारत की सुरक्षा पर ना पड़े। हम प्रधामनंत्री से ऐसी अपेक्षा करते हैं।'
अमेरिका के रक्षा मंत्री मार्क एस्पर ने शनिवार को कहा कि अगर तालिबान सुरक्षा गांरटी से इंकार करता है और अफगानिस्तान की सरकार के साथ वार्ता की प्रतिबद्धता से पीछे हटता है तो अमेरिका उसके साथ ऐतिहासिक समझौते को खत्म करने में नहीं हिचकेगा।
दोहा में अमेरिका और तालिबान के बीच समझौते पर हस्ताक्षर के बाद उनका बयान आया है। इसमें 14 महीने के अंदर अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी की समय सीमा तय की गई है।
लेकिन काबुल के दौरे में एस्पर ने चेतावनी दी, ‘‘अगर तालिबान अपने वादे से पीछे हटा तो वे अफगानों के साथ बैठने और अपने देश के भविष्य पर चर्चा करने के अवसर से चूक जाएंगे।’