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अफगान संकट: डूबते अफगान के लिए सालेह का सहारा, जहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता उस पंजशीर में बना रहे तालिबान विरोधी मोर्चा

प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Wed, 18 Aug 2021 04:49 PM IST

सार

अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद अमरुल्ला सालेह के ठिकाने को लेकर तरह-तरह के सवाल उठ रहे थे। पाकिस्तान समर्थक मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए यह अफवाह फैली कि वे अफगानिस्तान से भाग गए हैं। अमरूल्ला सालेह ने ट्वीट करके सारे अफवाहों को खारिज कर दिया।
 
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अमरूल्ला सालेह-पंजशीर घाटी - फोटो : Amar Ujala

अफगानिस्तान के उपराष्ट्रपति अमरूल्ला सालेह ने खुद को अफगानिस्तान का राष्ट्रपति घोषित कर लिया है। उन्होंने यह फैसला तब लिया जब राष्ट्रपति अशरफ गनी मुल्क छोड़कर भाग चुके हैं। सालेह का कहना है कि वह आखिरी दम तक तालिबान से लड़ेंगे और अपने मुल्क को कभी तालिबान के हवाले नहीं होने देंगे। वैसे आधिकारिक तौर पर भले ही अभी तक अफगानिस्तान में कोई सरकार न हो लेकिन अमरुल्ला सालेह के इस दावे ने अफगान नागरिकों में उम्मीद की एक नई किरण पैदा कर दी है।

वह अफगानियों के लिए सबसे बड़ी उम्मीद बन कर उभरे हैं क्योंकि उन्होंने विद्रोही तालिबान के साथ नई लड़ाई की कसम खाई है। सालेह अपने देश में ही हैं और वे काबुल के नजदीक उस पंजशीर घाटी से अपनी रणनीति बना रहे हैं जहां कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता। इसलिए पहले यह समझिए कि कितनी भयावह है पंजशीर घाटी।



कितनी खतरनाक है पंजशीर घाटी
पंजशीर की घाटी नॉर्दन अलायंस के पूर्व कमांडर अहमद शाह मसूद का गढ़ है। अफगानिस्तान के 34 प्रांतों में से एक पंजशीर देश के उत्तर-पूर्वी इलाके का हिस्सा है। राजधानी काबुल के नजदीक स्थित यह घाटी भौगौलिक दृष्टि से बेहद खतरनाक मानी जाती है। चारों तरफ से ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों से घिरे इस इलाके में बीच में मैदानी भाग है। अफगानिस्तान के लोग इसे भूल-भूलैया वाली और भूतिया जगह मानते हैं। यही वजह है कि 1980 से लेकर 2021 तक इसपर कभी भी तालिबान का कब्जा नहीं हो सका।

इतना ही नहीं, सोवियत संघ और अमेरिका की सेना भी इस इलाके में केवल हवाई हमले ही कर पाई। यहां की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए न तो तालिबान और न ही किसी दूसरे देश की सेना की इतनी हिम्मत हो सकी कि वह इस पर कोई जमीनी कार्रवाई कर सके। अभी भी तालिबान ने पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है लेकिन पंजशीर इलाके में घुसने की उसने हिमाकत नहीं की।


क्यों है सालेह अफगानिस्तान के सबसे बड़े हीरो
संकट में अपने नागरिकों को छोड़कर खुद मुल्क से भाग जाने वाले राष्ट्रपति अशरफ गनी को लोग जहां लानत-मलानत भेज रहे हैं, वहीं अमरूल्ला सालेह के लिए लोग दुआएं मांग रहे हैं। दरअसल सालेह तालिबान के सबसे बड़े विरोधी माने जाते हैं। अगर तालिबान किसी से डरता है तो वह सालेह ही है। अमरुल्ला सालेह ने अपने ट्विटर पर लिखा, "मैं उन लाखों लोगों को निराश नहीं करूंगा जिन्होंने मेरी बात सुनी। मैं तालिबान के साथ कभी भी एक छत के नीचे नहीं रहूंगा। कभी नहीं।" एक दूसरे ट्वीट में उन्होंने लिखा कि मैं किसी भी कीमत पर तालिबान के आगे नहीं झुक सकता।
 
 
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अमरूल्ला सालेह-पंजशीर घाटी - फोटो : Amar Ujala
अफगानिस्तान के उपराष्ट्रपति अमरूल्ला सालेह ने खुद को अफगानिस्तान का राष्ट्रपति घोषित कर लिया है। उन्होंने यह फैसला तब लिया जब राष्ट्रपति अशरफ गनी मुल्क छोड़कर भाग चुके हैं। सालेह का कहना है कि वह आखिरी दम तक तालिबान से लड़ेंगे और अपने मुल्क को कभी तालिबान के हवाले नहीं होने देंगे। वैसे आधिकारिक तौर पर भले ही अभी तक अफगानिस्तान में कोई सरकार न हो लेकिन अमरुल्ला सालेह के इस दावे ने अफगान नागरिकों में उम्मीद की एक नई किरण पैदा कर दी है।

वह अफगानियों के लिए सबसे बड़ी उम्मीद बन कर उभरे हैं क्योंकि उन्होंने विद्रोही तालिबान के साथ नई लड़ाई की कसम खाई है। सालेह अपने देश में ही हैं और वे काबुल के नजदीक उस पंजशीर घाटी से अपनी रणनीति बना रहे हैं जहां कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता। इसलिए पहले यह समझिए कि कितनी भयावह है पंजशीर घाटी।

कितनी खतरनाक है पंजशीर घाटी
पंजशीर की घाटी नॉर्दन अलायंस के पूर्व कमांडर अहमद शाह मसूद का गढ़ है। अफगानिस्तान के 34 प्रांतों में से एक पंजशीर देश के उत्तर-पूर्वी इलाके का हिस्सा है। राजधानी काबुल के नजदीक स्थित यह घाटी भौगौलिक दृष्टि से बेहद खतरनाक मानी जाती है। चारों तरफ से ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों से घिरे इस इलाके में बीच में मैदानी भाग है। अफगानिस्तान के लोग इसे भूल-भूलैया वाली और भूतिया जगह मानते हैं। यही वजह है कि 1980 से लेकर 2021 तक इसपर कभी भी तालिबान का कब्जा नहीं हो सका।

इतना ही नहीं, सोवियत संघ और अमेरिका की सेना भी इस इलाके में केवल हवाई हमले ही कर पाई। यहां की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए न तो तालिबान और न ही किसी दूसरे देश की सेना की इतनी हिम्मत हो सकी कि वह इस पर कोई जमीनी कार्रवाई कर सके। अभी भी तालिबान ने पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है लेकिन पंजशीर इलाके में घुसने की उसने हिमाकत नहीं की।

क्यों है सालेह अफगानिस्तान के सबसे बड़े हीरो
संकट में अपने नागरिकों को छोड़कर खुद मुल्क से भाग जाने वाले राष्ट्रपति अशरफ गनी को लोग जहां लानत-मलानत भेज रहे हैं, वहीं अमरूल्ला सालेह के लिए लोग दुआएं मांग रहे हैं। दरअसल सालेह तालिबान के सबसे बड़े विरोधी माने जाते हैं। अगर तालिबान किसी से डरता है तो वह सालेह ही है। अमरुल्ला सालेह ने अपने ट्विटर पर लिखा, "मैं उन लाखों लोगों को निराश नहीं करूंगा जिन्होंने मेरी बात सुनी। मैं तालिबान के साथ कभी भी एक छत के नीचे नहीं रहूंगा। कभी नहीं।" एक दूसरे ट्वीट में उन्होंने लिखा कि मैं किसी भी कीमत पर तालिबान के आगे नहीं झुक सकता।
 
 

अमहद मसूद (बीच में) अमरूल्ला सालेह (दाएं) - फोटो : Twitter@BBCYaldaHakim
पंजशीर की घाटी अहमद शाह मसूद का इलाका है। जहां अब उनका भाई और बेटा साथ में है। पंजशीर के नए नेता अहमद मसूद हैं, जो अहमद शाह मसूद के बेटे हैं। उन्होंने भी तालिबान के सामने आत्मसमर्पण करने से मना कर दिया है। स्वंयघोषित राष्ट्रपति अमरूल्ला सालेह अहमद मसूद के साथ मिलकर तालिबान से मुकाबला करने की रणनीति यहीं से बना रहे हैं। समझा जा रहा है कि तालिबान को अफगानिस्तान की सत्ता से खदेड़ने के लिए यहीं से आगाज होगा। सालेह की एक तस्वीर दुनिया के सामने आई जिसमें वे कई लोगों के साथ बात करते दिख रहे हैं। सालेह ने अपने तेवर साफ दिखाते हुए ट्वीट किया- ‘कभी भी और किसी भी परिस्थिति में तालिबान के आतंकवादियों के सामने नहीं झुकूंगा। मैं अपने नायक अहमद शाह मसूद, कमांडर, लीजेंड और गाइड की आत्मा और विरासत के साथ कभी विश्वासघात नहीं करूंगा’

माना जा रहा है कि एक बार फिर नॉर्दन अलायंस सक्रिय हो सकता है अमरुल्लाह सालेह इसके कमांडर बन सकते हैं क्योंकि अफगानिस्तान में जनाधार वाले नेता माने जाते हैं और तालिबान के धुर-विरोधी हैं। वे पंजशीर में ही पैदा हुए। वे अहमद शाह मसूद के नेतृत्व में बने नॉर्दन अलायंस के सदस्य थे और तालिबान के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उन्हें कथित तौर पर भारतीय खुफिया संगठनों द्वारा प्रशिक्षित किया गया था। वे अफगानिस्तान की सेना के साथ वहां की इंटेलिजेंस के मुखिया रह चुके हैं। वे इस पद पर छह साल रहे और तालिबानियों से लगातार लोहा लेते रहे। इस पद को छोड़ने के बाद भी वे तालिबान के लिए आक्रामक तेवर अपनाए रहे। 

कौन थे अहमद शाह मसूद
अहमद शाह मसूद पंजशीर घाटी के सबसे बड़े कमांडर थे। उन्हें अक्सर अफगानिस्तान का शेर-ए-पंजशीर कहा जाता था। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई  ने मसूद को राष्ट्रीय नायक कहा था। वे बड़े ताकतवर और युद्ध के महाराथी माने जाते थे। वे अमरूल्ला सालेह के खास और करीब लोगों में गिने जाते रहे हैं। वे तालिबान के बड़े विरोधियों में एक माने थे। 1990 के दशक में  अहमद शाह मसूद और उनके सहयोगियों ने साथ मिलकर तालिबान के राज को खत्म करने में अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने तालिबान के साथ जिस तरह संघर्ष किया, वे अफगान नागरिकों की नजर में हीरो बन गए थे।


 

तालिबान - फोटो : PTI
तालिबान ने 1997 में उत्तर अफ़ग़ानिस्तान में जीत हासिल कर ली थी, और मज़ारेशरीफ़ को अपने कब्ज़े में ले लिया था। तालिबान की जीत देखकर मसूद के साथी इस बात से डर गए कि शायद पंजशीर को भी संभालना मुश्किल होगा। उनके साथियों ने उनसे इलाका छोड़ने के लिए कहा, लेकिन वे जाने को तैयार नहीं हुए। मसूद ने कहा था चाहे मेरे साथ दो योद्धा भी बचें, मैं अपनी जमीन नहीं छोड़ूंगा। 80 के दशक में अहमद शाह मसूद ने सोवियत रूस की सेना से मुकाबला किया था। बाद में जब तालिबान आए तो वो भी पंजशीर पर कब्जा नहीं कर सके। मसूद तालिबान के कट्टर दुश्मनों में एक थे। इसलिए तालिबान और अलकायदा  ने मिलकर 9/11 के हमले से दो दिन पहले उनकी फिदायीन हमले में हत्या कर दी। अब उनका बेटा अहमद मसूद भी अपने पिता की तरह तालिबान से मुकाबला कर रहा है। 

भारत से भी रहा मसूद का संबंध 
नार्दन अलायंस की मदद के लिए ही भारत ने अफगानिस्तान में अपना पहला विदेशी सैन्य बेस बनाया था। बताया जाता है कि मसूद के भारत के साथ भी अच्छे संबंध थे। एक किस्से का अक्सर जिक्र आता है कि एक बार जब तालिबान के हमले में जब वे बुरी तरह घायल हो गए थे तब भारत ने ही उनको एयरलिफ्ट कर ताजिकिस्तान के फर्कहोर एयरबेस पर इलाज किया था।

क्या था नार्दन अलायंस 
नार्दन अलायंस वह संगठन है जो शुरू से ही तालिबान का विरोध करती रही है। एक सैन्य मोर्चे के रूप में नॉर्दन अलायंस का गठन 1996 में हुआ था। तालिबान के नियंत्रण से अफगानिस्तान को मुक्त कराने के लिए नॉर्दन अलायंस ने निर्णायक लड़ाई लड़ी थी। इस अलायंस को ईरान, रूस, तुर्की, भारत और ताजिकिस्तान का समर्थन हासिल था। बाद में अमेरिकी सेना ने जब तालिबान पर हमला किया तो उसे नॉर्दन अलायंस ने अपना समर्थन और सहयोग दिया। साल 2001 में तालिबान को हराने के बाद नॉर्दन अलायंस  भंग हो गया और इसके सदस्य बाद में अफगान सरकार का हिस्सा बन गए। 
 
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