भारत का सर्विलांस सैटेलाइट जीसैट-7 (GSAT7) भारतीय नौसेना के लिए एक आंख की तरह काम कर रहा है। खास तौर पर जीसैट -7ए (एंग्री बर्ड) के साथ मिलकर हिंद महासागर में चीन की गतिविधियों पर नजर रखता है। ये दोनों सैटेलाइट खास तौर पर भारतीय नौसेना और वायु सेना के लिए बनाए गए हैं। जीसैट-7 को 2013 में लॉन्च किया गया था और इसे रुक्मिणी भी कहा जाता है। ये पहला ऐसा सैटेलाइट है जिसे नौसेना ने इस्तेमाल करना शुरू किया था।
जीसैट-7 सैटेलाइट की भूमिका
GSAT 7 शृंखला के उपग्रह रक्षा सेवाओं की संचार ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा विकसित उन्नत उपग्रह है। GSAT 7 (रुक्मिणी) सैन्य संचार जरूरतों के लिए सेवाओं की एक शृंखला प्रदान करता है, जिसमें मल्टी-बैंड संचार सहित लो बिट वॉयस रेट से लेकर हाई बिट वॉयस रेट जैसी डेटा सुविधाएँ शामिल हैं। यह भारत का पहला सैन्य उपग्रह है। GSAT 7 उपग्रह को अगस्त, 2013 में फ्रेंच गुयाना के कौरौ से एरियन 5 ECA रॉकेट द्वारा लॉन्च किया गया था। यह 2,650 किलोग्राम का उपग्रह है जिसकी हिंद महासागर क्षेत्र में लगभग 2,000 समुद्री मील की दूरी है। यह उपग्रह मुख्य रूप से भारतीय नौसेना द्वारा संचार से संबंधित अपनी जरूरतों के लिए उपयोग किया जाता है।
इसी तरह जीसैट-7ए को 2018 में लॉन्च किया गया था और इसे एंग्री बर्ड भी कहा जाता है। यह पूरी तरह भारतीय वायुसेना के लिए समर्पित है। यह कई वायुसेना प्लेटफॉर्म जैसे एयरक्राफ्ट, चॉपर्स, ड्रोन, एयरबोर्न वॉर्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम और राडार को आपस में जोड़ती है। अभी सेना जीसैड-7ए की 30 फीसदी संचार क्षमता का उपयोग कर रही है।
सीजैट-7A उपग्रह की भूमिका
GSAT 7A को वर्ष 2018 में श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया गया था। यह उपग्रह भारतीय वायुसेना के ग्राउंड राडार स्टेशनों, एयरबेस और एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल एयरक्राफ्ट (AEW&C) के बीच संपर्क बढ़ाने में मदद करता है। यह मानव रहित हवाई वाहनों (UAV) के उपग्रह नियंत्रित संचालन में भी मदद करता है जो जमीन नियंत्रित संचालन की तुलना में संचालन को बहुत अधिक विश्वसनीयता प्रदान करता है। इस उपग्रह में मोबाइल उपयोगकर्त्ताओं के लिए स्विच करने योग्य आवृत्ति के साथ केयू बैंड में 10 चैनल और एक निश्चित ग्रेगोरियन या परवलयिक एंटीना व चार स्टीयरेबल एंटीना होते हैं।
इन दोनों सैटेलाइट की इन दिनों सोशल मीडिया पर भी धूम मची हुई है। इनका इस्तेमाल खास तौर चीन के जासूसी जहाज युआन वांग-5 की गतिविधियों पर नजर रखने में होता है जो एक सप्ताह के लिए श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह पर आया था। चीनी जासूसी जहाज ने भारत के लिए खतरा पैदा किया है और ये सैटेलाइट उससे निपटने का काम कर रहे हैं।
चीनी जासूसी जहाज लौटा
श्रीलंका में चीन द्वारा विकसित किए गए हंबनटोटा बंदरगाह में रुका चीनी जासूसी जहाज युआन वांग-5 सोमवार को यहां से रवाना हो गया। रॉयटर्स के मुताबिक, चीन का ये जासूसी जहाज एक सप्ताह के प्रवास के बाद सोमवार को रवाना हुआ। चीन के इस जासूसी जहाज को लेकर खासा विवाद भी हुआ था और भारत ने इसे लेकर श्रीलंका के सामने एतराज जताया था। श्रीलंका ने पोत को न लाने की सलाह भी दी धी, लेकिन चीन ने इसे साफ तौर पर खारिज करते हुए यहां पड़ाव डाला था।
बता दें कि भारत की आपत्ति के बावजूद चीनी शोध पोत युआन वांग-5 (Chinese research vessel Yuan Wang 5) एक सप्ताह पहले श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह पहुंचा था। श्रीलंका सरकार ने उसे अपने बंदरगाह पर आने की इजाजत दे दी थी। वैसे तो इस पोत को शोध जहाज कहते हैं, लेकिन मुख्य रूप से ये चीनी सेना के लिए जासूसी करता है।
यह पोत उच्च तकनीकों से लैस है, इसलिए भारत ने इससे जासूसी की आशंका जताई थी। भारत सरकार ने इस उच्च तकनीकी से लैस शोध पोत को लेकर चिंता व्यक्त की थी कि जहाज भारत के खिलाफ जासूसी कर सकता है। इसे लेकर भारत ने श्रीलंका से आपत्ति भी दर्ज कराई थी। इन चिंताओं के बाद भी चीनी शोध पोत को हंबनटोटा आने की अनुमति दी गई। श्रीलंका के बंदरगाह मास्टर निर्मल पी सिल्वा ने कहा था कि उन्हें चीनी जहाज को 16 से 22 अगस्त तक हंबनटोटा बंदरगाह पर बुलाने के लिए विदेश मंत्रालय की मंजूरी मिल गई है। हंबनटोटा बंदरगाह रणनीतिक रूप से संवेदनशील है। बंदरगाह को बड़े पैमाने पर चीनी कर्ज से विकसित किया गया है।
मिसाइलों और सैटेलाइट को ट्रैक करता है चीनी पोत
चीन का जासूसी पोत युआन वांग-5 पोत बैलिस्टिक मिसाइल और सैटेलाइटों को ट्रैक करता है। भारत ने श्रीलंका के सामने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंता जाहिर करते हुए कहा था कि जहाज पर लगे ट्रैकिंग सिस्टम इस तटीय क्षेत्र में भारतीय सुरक्षा ढांचे की जानकारी जुटा सकते हैं। इसका इस्तेमाल चीन की सैन्य पनडुब्बियों व पोतों के लिए भी किया जा सकता है।