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43 साल पहले सूडान और कांगो में फैला था इबोला, नहीं बच पाते हैं 90 फीसदी पीड़ित

अनिल पांडेय
Updated Tue, 23 Jul 2019 08:54 PM IST
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इबोला - फोटो : social media
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अफ्रीकी देश कांगो में फैले इबोला वायरस के प्रकोप को गंभीरता से लेते हुए अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल (पीएचईआईसी) घोषित किया है। यह बेहद जानलेवा बीमारी है और मरीज की मौत के बाद भी इसके वायरस फैल सकते हैं।

इबोला बेहद खतरनाक है और इस बीमारी की वजह से होने वाली दिक्कतें जानलेवा होती हैं। इस बीमारी की वजह से 90 प्रतिशत मरीज बच नहीं पाते हैं। साधारण शब्दों में समझें तो इस बीमारी से पीड़ित 100 में से 90 मरीजों की निश्चित तौर पर मौत हो जाती है। इबोला को अब तक के सबसे खतरनाक प्रकोप के रूप में देखा जा रहा है।

एक दशक पहले 1600 की हुई थी मौत

अफ्रीकी देश कांगो में अगस्त 2018 में सबसे पहले इबोला फैला था और उसकी वजह से लगभग 1600 लोगों की मौत हो गई थी। अब इस बीमारी ने बड़ा रूप ले लिया है और यह कांगो के बाहर भी फैल रही है। कांगो के बाहर रवांडा की सीमा पर पिछले सप्ताह गोमा में इबोला के लक्षण मिलने की पुष्टि हुई थी। जानकारी और जागरूकता के बावजूद, इबोला अविकसित और विकासशील देशों में तेजी से फैल रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि इन देशों में जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं मानक स्तर की नहीं है और यदि हैं भी तो काफी कम हैं।

इस बार चिंता क्यों

इस बार इबोला की पुष्टि अफ्रीकी महाद्वीप के देश कांगो के गोमा शहर में हुई है। फिलहाल, इस शहर में बीमारी से संक्रमित पहले मरीज की पुष्टि हुई है। लेकिन, डर इस बात को लेकर सता रहा है कि लगभग 20 लाख की घनी आबादी वाले इस शहर में यदि बीमारी फैली तो इस पर काबू पाना काफी मुश्किल होगा।


डर इस बीमारी के दूसरे देशों में फैलने को लेकर भी है। गोमा रवांडा सीमा पर पूर्वोत्तर कांगो में महत्वपूर्ण शहर है जो एक अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे से सटा हुआ है। कांगो और दुनिया के बाकी हिस्सों में दाखिल होने के रास्ते भी शहर से होकर निकलते हैं।

कांगो एक ऐसा क्षेत्र है जिसे युद्ध ग्रस्त माना जाता है। इसलिए बीमारी के फैलने का डर ज्यादा है। हालांकि, कांगो सरकार ने कहा है कि संक्रमित व्यक्ति और अन्य की पहचान के कारण गोमा में इस बीमारी के फैलने का खतरा कम है।
 
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इबोला - फोटो : social media
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अफ्रीकी देश कांगो में फैले इबोला वायरस के प्रकोप को गंभीरता से लेते हुए अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल (पीएचईआईसी) घोषित किया है। यह बेहद जानलेवा बीमारी है और मरीज की मौत के बाद भी इसके वायरस फैल सकते हैं।

इबोला बेहद खतरनाक है और इस बीमारी की वजह से होने वाली दिक्कतें जानलेवा होती हैं। इस बीमारी की वजह से 90 प्रतिशत मरीज बच नहीं पाते हैं। साधारण शब्दों में समझें तो इस बीमारी से पीड़ित 100 में से 90 मरीजों की निश्चित तौर पर मौत हो जाती है। इबोला को अब तक के सबसे खतरनाक प्रकोप के रूप में देखा जा रहा है।

एक दशक पहले 1600 की हुई थी मौत

अफ्रीकी देश कांगो में अगस्त 2018 में सबसे पहले इबोला फैला था और उसकी वजह से लगभग 1600 लोगों की मौत हो गई थी। अब इस बीमारी ने बड़ा रूप ले लिया है और यह कांगो के बाहर भी फैल रही है। कांगो के बाहर रवांडा की सीमा पर पिछले सप्ताह गोमा में इबोला के लक्षण मिलने की पुष्टि हुई थी। जानकारी और जागरूकता के बावजूद, इबोला अविकसित और विकासशील देशों में तेजी से फैल रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि इन देशों में जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं मानक स्तर की नहीं है और यदि हैं भी तो काफी कम हैं।

इस बार चिंता क्यों

इस बार इबोला की पुष्टि अफ्रीकी महाद्वीप के देश कांगो के गोमा शहर में हुई है। फिलहाल, इस शहर में बीमारी से संक्रमित पहले मरीज की पुष्टि हुई है। लेकिन, डर इस बात को लेकर सता रहा है कि लगभग 20 लाख की घनी आबादी वाले इस शहर में यदि बीमारी फैली तो इस पर काबू पाना काफी मुश्किल होगा।

डर इस बीमारी के दूसरे देशों में फैलने को लेकर भी है। गोमा रवांडा सीमा पर पूर्वोत्तर कांगो में महत्वपूर्ण शहर है जो एक अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे से सटा हुआ है। कांगो और दुनिया के बाकी हिस्सों में दाखिल होने के रास्ते भी शहर से होकर निकलते हैं।

कांगो एक ऐसा क्षेत्र है जिसे युद्ध ग्रस्त माना जाता है। इसलिए बीमारी के फैलने का डर ज्यादा है। हालांकि, कांगो सरकार ने कहा है कि संक्रमित व्यक्ति और अन्य की पहचान के कारण गोमा में इस बीमारी के फैलने का खतरा कम है।
 

इबोला - फोटो : social media

क्या है यह वायरस

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, इबोला एक किस्म की वायरल बीमारी है। इसके शुरुआती लक्षण अचानक बुखार, कमजोरी, मांसपेशियों में दर्द और गले में खराश होना है। इस बीमारी में शरीर में नसों से खून बाहर आना शुरू हो जाता है, जिससे शरीर के अंदर रक्तस्राव शुरू हो जाता है और इससे 90 प्रतिशत रोगियों की मृत्यु हो जाती है। इबोला वायरस 2 से 21 दिन में शरीर में पूरी तरह फैल जाता है। मनुष्यों में इसका संक्रमण संक्रमित जानवरों, जैसे, चिंपैंजी, चमगादड़ और हिरण आदि के सीधे संपर्क में आने से होता है।

ऐसे फैलता है इबोला

इबोला वायरस संक्रमित जानवरों के काटने या खाने से लोगों में फैलता है।
एक दूसरे के बीच इसका संक्रमण संक्रमित रक्त, द्रव या अंगों के जरिये यह फैलता है।
इबोला के शिकार व्यक्ति का अंतिम संस्कार भी खतरे से खाली नहीं होता है।
शव को छूने से भी इसका संक्रमण हो सकता है।
इबोला के रोगी को अलग रखा जाता है।
बिना सावधानी के इलाज करने वाले चिकित्सकों को भी इससे संक्रमित होने का भारी खतरा रहता है।
संक्रमण के चरम तक पहुंचने में दो दिन से लेकर तीन सप्ताह तक का वक्त लग सकता है और इसकी पहचान और भी मुश्किल है।
इससे संक्रमित व्यक्ति के ठीक हो जाने के सात सप्ताह तक संक्रमण का खतरा बना रहता है।
यह भी आशंका है कि संक्रमित चमगादड़ों के मल-मूत्र से संपर्क में आने से इबोला वायरल फैल सकता है।

इबोला के लक्षण

मुंह, कान, नाक से खून बहना
उल्टी होना, पेट दर्द होना
शरीर में दर्द होना
कमजोरी और फ्लू जैसे लक्षण
शरीर पर फुंसी हो जाना 

बीमारी फैलने का खतरा ज्यादा

डब्ल्यूएच की रिपोर्ट के मुताबिक, अब तक चार बार जानलेवा इबोला की वजह से इमरजेंसी लागू हो चुकी है। डब्ल्यूएचओ के प्रमुख टेड्रोस एदहानोम घेब्रेयीसस ने जिनेवा में अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल की घोषणा के बाद कहा कि क्षेत्र में इस बीमारी के फैलने का खतरा बहुत ज्यादा है लेकिन यहां से बाहर जाने की आशंका कम है। लेकिन, यदि बीमारी फैली तो डब्ल्यूएचओ का अनुमान है कि इसे रोकने के लिए करोड़ों डॉलर की जरूरत पड़ेगी। वैसे बता दें कि वैश्विक स्वास्थ्य आपदा की घोषणा अक्सर अंतरराष्ट्रीय मदद एवं ध्यान खींचने के लिए ही की जाती है। साथ ही ये चिंताएं भी होती हैं कि प्रभावित सरकारें सीमाओं को बंद न कर दें। हालांकि, टेड्रोस ने कहा कि यह घोषणा ज्यादा रकम जुटाने के लिए नहीं की गई है।

इबोला - फोटो : Social media
अब तक नहीं मिला इलाज

इस बीमारी के बारे में पता चलने से लेकर अब तक इसका कोई मुकम्मल इलाज अब तक नहीं खोजा जा सका है। यही वजह है कि इबोला के मामलों में मौत का प्रतिशत 90 से ज्यादा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसकी संक्रमण गति इतनी तेज है कि यह महज दो साल में पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले सकता है।

यह इतना घातक है कि पूरे पश्चिमी अफ्रीका से इंसानों की आबादी को खत्म कर सकता है। इसका टीका तो इजाद हो चुका है लेकिन वह भी अभी परीक्षणों के दौर में ही है। परीक्षण के तौर पर 163,000 हजार लोगों को यह टीका लगाया गया है। लेकिन अभी भी इसके संतोषजनक परिणाम आने बाकी हैं। भारत में साल 2014 में लाइबेरिया से आए एक युवक में इबोला वायरस पाया गया था। हालांकि, उसे दिल्ली के इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पर ही रोक लिया गया था। फिलहाल इस बीमारी को लेकर फिर अलर्ट किया गया है।

ये हैं रोकथाम के प्रयास

इबोला वायरस के खिलाफ वैज्ञानिक अब तक कोई टीका नहीं बना पाए हैं और ना ही कोई इसे खत्म करने के लिए बाजार में कोई दवा उपलब्ध है। इसकी रोकथाम का केवल एक ही तरीका है, जागरूकता। विश्व स्वास्थ्य संगठन की कोशिश है कि लोगों को समझाया जा सके कि इबोला के मामलों को दर्ज कराना कितना जरूरी है। इबोला से बचने के लिए निम्न सतर्कता भी अपनाई जा सकती हैः

हाथों को रखें स्वच्छ: अपने हाथों को हमेशा साबुन और पानी से साफ रखें। हाथों को सुखाने के लिए स्वच्छ तौलिए का इस्तेमाल करें। वायरस को मारने का यह सबसे प्रभावी तरीका है। हाथ धोने के लिए अच्छी कंपनी का हैंडवॉश इस्तेमाल करें।

हाथ ना मिलाएं: हाथ मिलाने से यथासंभव बचें क्योंकि यह वायरस शरीर के सीधे संपर्क से तेजी से फैलता है।

स्पर्श से बचें: अगर आपको किसी व्यक्ति पर इबोला से संक्रमित होने का संदेह है तो उन्हें स्पर्श न करें। यह वायरस पेशाब, मल, रक्त, उल्टी, पसीना, आंसू, शुक्राणु और योनि से होने वाले स्राव के संपर्क से फैलता है। अगर आपको लगता है कि किसी व्यक्ति की मौत इबोला वायरस की वजह से हुई है, तो उसके शरीर को छूने से बचें। किसी बीमार व्यक्ति की तुलना में मृत व्यक्ति से वायरस के संक्रमण का खतरा अधिक होता है।

मांसाहार से बचें: बंदर, चिंपैंजी, चमगादड़ का मांस नहीं खाएं क्योंकि विशेषज्ञों का मानना है कि मनुष्यों में इसका संक्रमण इन्हीं जानवरों के संपर्क में आने से हुआ। शिकार करने और जानवरों को छूने से बचें। यह सावधानी जरूर रखें कि मांस को ठीक से पकाया गया है।

डॉक्टर के पास जाने में हिचके नहीं: डॉक्टर से डरें नहीं, वे आपकी मदद करने के लिए हैं। अस्पताल किसी भी मरीज के लिए सबसे सही जगह है। यहां मरीज को पानी की कमी से बचाया जा सकता है और दर्द निवारक दवा भी दी जा सकती हैं।
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