विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अफ्रीकी देश कांगो में फैले
इबोला वायरस के प्रकोप को गंभीरता से लेते हुए अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल (पीएचईआईसी) घोषित किया है। यह बेहद जानलेवा बीमारी है और मरीज की मौत के बाद भी इसके वायरस फैल सकते हैं।
इबोला बेहद खतरनाक है और इस बीमारी की वजह से होने वाली दिक्कतें जानलेवा होती हैं। इस बीमारी की वजह से 90 प्रतिशत मरीज बच नहीं पाते हैं। साधारण शब्दों में समझें तो इस बीमारी से पीड़ित 100 में से 90 मरीजों की निश्चित तौर पर मौत हो जाती है। इबोला को अब तक के सबसे खतरनाक प्रकोप के रूप में देखा जा रहा है।
एक दशक पहले 1600 की हुई थी मौत
अफ्रीकी देश कांगो में अगस्त 2018 में सबसे पहले इबोला फैला था और उसकी वजह से लगभग 1600 लोगों की मौत हो गई थी। अब इस बीमारी ने बड़ा रूप ले लिया है और यह कांगो के बाहर भी फैल रही है। कांगो के बाहर रवांडा की सीमा पर पिछले सप्ताह गोमा में इबोला के लक्षण मिलने की पुष्टि हुई थी। जानकारी और जागरूकता के बावजूद, इबोला अविकसित और विकासशील देशों में तेजी से फैल रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि इन देशों में जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं मानक स्तर की नहीं है और यदि हैं भी तो काफी कम हैं।
इस बार चिंता क्यों
इस बार इबोला की पुष्टि अफ्रीकी महाद्वीप के देश कांगो के गोमा शहर में हुई है। फिलहाल, इस शहर में बीमारी से संक्रमित पहले मरीज की पुष्टि हुई है। लेकिन, डर इस बात को लेकर सता रहा है कि लगभग 20 लाख की घनी आबादी वाले इस शहर में यदि बीमारी फैली तो इस पर काबू पाना काफी मुश्किल होगा।
डर इस बीमारी के दूसरे देशों में फैलने को लेकर भी है। गोमा रवांडा सीमा पर पूर्वोत्तर कांगो में महत्वपूर्ण शहर है जो एक अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे से सटा हुआ है। कांगो और दुनिया के बाकी हिस्सों में दाखिल होने के रास्ते भी शहर से होकर निकलते हैं।
कांगो एक ऐसा क्षेत्र है जिसे युद्ध ग्रस्त माना जाता है। इसलिए बीमारी के फैलने का डर ज्यादा है। हालांकि, कांगो सरकार ने कहा है कि संक्रमित व्यक्ति और अन्य की पहचान के कारण गोमा में इस बीमारी के फैलने का खतरा कम है।