पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमानों के उत्पीड़न के मामले अकसर सामने आते रहते हैं। इस बीच, सामने आया है कि पड़ोसी मुल्क में इस साल अब तक अहमदी अल्पसंख्यक समुदाय के कम से कम 40 पूजा स्थलों को या तो कट्टरपंथियों ने निशाना बनाया है, या फिर पुलिस ने आंशिक रूप से उन्हें ध्वस्त कर दिया है। इससे पहले, फरवरी में पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) की एक रिपोर्ट आई थी। जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान में खास तौर पर पंजाब प्रांत में अमहमदिया मुसलमानों के उत्पीड़न में बढ़ोतरी हुई है।
40 पूजा स्थलों को बनाया गया निशाना
जमात-ए-अहमदिया पाकिस्तान के पंजाब के एक अधिकारी अमीर महमूद ने इस साल अब तक पूजा स्थलों पर हुए हमलों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि इस साल जनवरी से अक्तूबर के बीच पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों में हमारे पूजा स्थलों को अपवित्र करने की कम से कम 40 घटनाएं हुईं। उनमें से 11 सिंध में और बाकी पंजाब प्रांत में हुईं।
तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान के कट्टरपंथी करते हैं हमले
उन्होंने आगे बताया कि सिंध में, कुछ अहमदी पूजा स्थलों पर धार्मिक चरमपंथियों ने हमला किया था। उस दौरान पुलिस मूकदर्शक बनी रही। महमूद ने कहा कि हमलों के ज्यादातर मामले कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) से जुड़े हैं। उनके कट्टरपंथी अनुयायियों ने अहमदी पूजा स्थलों पर हमला किया। वहीं, कुछ अन्य मामलों में पुलिस ने धार्मिक चरमपंथियों के दबाव में आकर मीनारों और मेहराबों को ध्वस्त कर दिया। इतना ही नहीं पुलिस ने प्रार्थना कक्षों से पवित्र लेख तक हटा दिए।
पुलिस नहीं करती है कोई कार्रवाई
महमूद ने आरोप लगाते हुए कहा कि अहमदी पूजा स्थलों पर हमला करने के इतने मामलों के बाद भी पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। हमला करने वाले धार्मिक चरमपंथियों के खिलाफ अब तक एक भी मामला दर्ज नहीं किया गया है। उन्होंने इसके लिए पंजाब की कार्यवाहक सरकार को भी दोषी ठहराया। महमूद ने कहा कि वर्तमान कार्यवाहक सरकार के कार्यकाल के दौरान सूबे में करीब 30 ऐसी घटनाएं हुईं हैं।
जमात-ए-अहमदिया पाकिस्तान ने कहा कि पहले से ही हाशिए पर मौजूद समुदाय के लिए स्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है। अहमदियों को अराजत तत्वों के हाथों उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। पाकिस्तान के विभिन्न इलाकों में पूजा स्थलों को अपवित्र करने की घटनाएं लगातार जारी हैं।
एचआरसीपी ने जताई इन मुद्दों पर चिंता
इससे पहले, पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में अल्पसंख्यक समुदाय के सामने आने वाले विभिन्न मुद्दों पर चिंता जाहिर की थी। इन मुद्दों में अहमदी कब्रों को अपवित्र करना, उनके पूजा स्थलों पर मीनारों को नष्ट करना और सदस्यों के खिलाफ ईद पर अनुष्ठान पशु बलि देने के लिए दर्ज की गई एफआईआर शामिल हैं। इसमें कहा गया था कि असल चिंता की बात यह है कि प्रशासनिक अधिकारियों के बीच ऐसी धारणा बन गई है कि कुछ कानूनी और संवैधानिक प्रावधान इस तरह के उत्पीड़न के लिए जगह प्रदान करते हैं, जबकि संविधान के अनुच्छेद 20 (बी) के तहत ऐसा नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के 2014 और 2021 फैसलों को लागू करने की सिफारिश
एचआरसीपी ने अपनी रिपोर्ट में अहमदिया समुदाय के प्रति हिंसा की ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए पुलिस की क्षमता विकसित करने का आह्वान किया था। साथ ही अपनी रिपोर्ट में एचआरसीपी के सर्वे मिशन ने 2014 और 2021 के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को लागू करने की सिफारिश भी की, जिसमें धार्मिक अल्पसंख्यकों के पूजा स्थलों की सुरक्षा के लिए एक विशेष पुलिस बल की स्थापना करना शामिल है।
लगातार होते रहते हैं अहमदिया समुदाय के खिलाफ हमले
पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय के खिलाफ उत्पीड़न के मामले लगातार होते रहते हैं। बीते महीने ही अहमदिया समुदाय की एक बुजुर्ग महिला को पंजाब के सियालकोट जिले में एक स्थानीय मौलवी और उनके अनुयायियों द्वारा कब्रिस्तान में दफनाने से इनकार कर दिया गया था। पाकिस्तान में इस तरह के हमलों की लंबी फेहरिस्त है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में अगस्त 2022 में लाहौर से लगभग 150 किमी दूर फैसलाबाद में समुदाय से जुड़ी सोलह कब्रों को अज्ञात व्यक्तियों द्वारा तोड़ दिया गया था। 2017 के बाद से अलग-अलग कट्टरपंथी हमलों में 40 से अधिक अहमदी मारे गए हैं। गौरतलब है कि यह रिपोर्ट फरवरी 2023 में आई थी।
पाकिस्तान में अहमदियों के खिलाफ अक्सर ईशनिंदा के मामले दर्ज किए जाते हैं, जिसकी सजा मृत्युदंड तक है। पिछले कुछ समय में कई अहमदियों पर ईशनिंदा का आरोप लगाया गया और उनकी हत्या तक कर दी गई। मई 2022 में एक ऐसी ही घटना में 33 वर्षीय अबुल सलाम की हत्या कर दी गई थी।
गौरतलब है कि पाकिस्तान में अहमदियों को आमतौर पर कादियानी कहा जाता है। इसे वे अपमानजनक शब्द मानते है। 1974 में पाकिस्तान की संसद ने अहमदी समुदाय को गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया था। इसके एक दशक बाद, उन पर खुद को मुस्लिम कहने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। उन पर उपदेश देने और तीर्थयात्रा के लिए सऊदी अरब जाने पर प्रतिबंध लगा हुआ है।